Friday, April 18, 2014

माँ के आँसू....

माँ के आँसू, कैसे समझें 
सुख में दुख में, ये गिरते हैं. 
बारिश के मौसम में बूँदें 
पतझड़ में पत्ते गिरते हैं. 

जब पहला 'शब्द' कहा कुछ हमने, 
या हम पहली बार 'चले' थे. 
स्कूल का 'पहला दिन' था अपना, 
या फिर कभी, 'ईनाम' मिले थे. 

माँ रोई हर उस इक पल में 
पूछा, कहा 'खुशी है ऐसी' 
समझ ना आया, कुछ भी हमको 
रोने की ये वज़ह है कैसी? 

जब भी कोई ग़लती करते, 
डाँट पड़े, या खाते मार. 
हम से ज़्यादा, खुद वो रोती, 
कहती ये मेरा अधिकार. 

जीवन की असली बगिया में, 
पाँव रखे, हमने जिस दिन. 
इंतज़ार वो तब भी करती, 
चिंता की घड़ियाँ गिन-गिन. 

लाख़ कहा उसको ये हमने, 
फिक्र हमारी क्यूँ करती हो? 
खुद का भी तुम,कभी तो सोचो 
मुफ़्त में ही आँखें भरती हो! 

सोचो, मेरी 'माँ' के आँसू 
उन लम्हों में भी, वो रो दी. 
'माँ' है तो दुनिया है सबकी 
'ज़िंदगी' वरना 'व्यर्थ' में खो दी. 

प्रीति 'अज्ञात'

यही वादा था, न .... !

आज वो अकेली है और कुछ अनमनी भी
देखा उसने खुद को दर्पण में
घबरा गई, अपने ही विकृत झुर्रीदार प्रतिबिंब से
तभी अचानक ही फिसलकर 
माथे पे गिरी एक लट
खुद को ही रंगे जाने की पुरज़ोर
सिफ़ारिश करने लगी.

ठीक ही तो कहता है वो
अब सपनों की उम्र नहीं तेरी
काँपते मन से, अचकचाकर
दौड़कर खोला है उसने
अपनी ख़्वाबों की अलमारी को
हर खांचा, खचाखच भरा हुआ
एक अधूरेपन की कहानी-सी कहता.

सबसे पहले फेंका उसने
'ज़िंदगी' का सपना
हाँ, यही स्वप्न तो जन्म-दाता है
आकांक्षाओं का, अपेक्षाओं का
फिर उछाल बाहर किए
झाँकते, मटमैले से, घिनौने सपने
जिन पर लगे हुए जाले और घूमती मकड़ी 
उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न-सा लगा
बरसों से भटक रहे हैं.

कर दी है, खाली उसने पूरी अलमारी
भर देगी फिर इसे छकाछक
कर्तव्यों की चादरों से
पर ये क्या, अभी भी कोने में
दूबका हुआ एक मायूस ख्वाब बैठा है
उसके सहमे हुए बचपन की तरह
जीना चाहता है, चीख रहा है
न निकालने की गुहार करते हुए.

जा, आज से तू
खबरदार, जो अब कभी पला
इन पलकों के भीतर
और फिर एक गुस्सैल-सी माँ की तरह
धक्के मारकर खींचती हुई
ले आई वो उस आख़िरी ख़्वाब को भी घसीटकर
धकेल दिया है उसे जबरन ही
उस गंदे, बदबूदार कचरे के डिब्बे में
कि वही उसकी सही जगह थी.

हाँ, अपने हाथ झाड़कर, 
डेटोल से धो भी लिए हैं उसने
उन मरते सपनों की
सड़न ही कुछ ऐसी थी
पर रो रही है, बेतहाशा
अपने इस 'ज़िंदा' बचपन की 
असामयिक मौत पर
जान जो चुकी है
हर उखड़ी साँस पैदा करेगी
शब्दों में ढली, चुभती इक टीस को
पर ये अलमारी अब यूँ ही
खाली रहेगी, उम्र-भर
ठीक उसके अचानक ही 
गंभीरता का जामा पहनाए गए
इस रंगहीन जीवन की तरह....!! 

प्रीति 'अज्ञात'

Saturday, March 1, 2014

यूँ ही....

हाथों में एक रिपोर्ट-कार्ड
वही इकलौता कार्ड 
जहाँ हम चाहते हैं, कि
हर टेस्ट का रिज़ल्ट 'नेगेटिव' हो.
कुछ पलों के लिए, जैसे 
थम-सा जाता है समय
यूँ तो हुआ करता है, बीच में
लोगों का आवागमन
सुनते हैं किस्से-कहानियाँ
थोड़ी राय, थोड़ा आश्वासन.
जीवन का सारा मनोविज्ञान
एक ही झटके में
तैरने लगता है आँखों में
जब चल रही होती है
एक शल्य-चिकित्सा मरीज पर
और दूसरी उसके ही मस्तिष्क के भीतर !
मन उधेड़कर रख देता है
भौतिकवादी दुनिया का हर निर्मम सच.
बहुत कुछ महसूस होता है
दरवाजे के उस पार, पर
अचानक जैसे सब, सिमट जाता है
एक कमरे के अंदर
और कोई कहता है कि, जीने के लिए ज़रूरी है
बस गिनती की कुछ धड़कनें
और श्वास-प्रश्वास की मद्धिम-सी गति
छोड़ो न ! व्यर्थ की भागा-दौड़ी
सुनो तो ज़रा, करीब से
देखो, कितना कुछ कह गया,
बिन बोले ही
अस्पताल का ये छोटा सा कमरा !

प्रीति 'अज्ञात'

Sunday, February 23, 2014

शब्द-सेतु

तुम्हारे और मेरे बीच
एक सेतु हुआ करता था
जिस पर चलकर रोजाना ही 
विश्वास की गहरी नींव
और स्नेह-जल की फुहारों में
गोता खाते हुए हमारे शब्द 
मचलकर एक-दूसरे तक 
पहुँच इठलाया करते थे.

बहुत गुमान था, हमें
कभी भी इसके न टूटने का
यूँ तो था ये केवल अपना ही
पर अपनेपन में, हमने गुजरने दिया 
कुछ अंजान लोगों को भी इससे होकर
वह दौर ही कुछ ऐसा था
जहाँ आभास तक न था
किसी की मंशा और इस संशय का.

धीरे-धीरे न जाने कितने मुसाफ़िर
चलने लगे, आम रास्ता समझ
हाँ, बहुत ख़ास था ये
बस मेरा-तुम्हारा
पर होता गया मलीन
लोगों की बेरोक-टोक आवाजाही से
भरते रहे सब अपने विचारों की गंदगी
बढ़ता ही गया, अनपेक्षित भार.

देखो  ! आज जब, वही लोग
इस पर हंसते-गुनगुनाते
नज़र आते हैं, तब
हमारे लिए कमजोर हो 
डगमगाने लगा है, ये शब्द-सेतु
और अब, मैं और तुम, 
बैठे हैं, इसके दोनों सिरों पर
अलग-अलग, बेहद उदास और गुमसूम 
भयभीत हैं, उस मंज़र की कल्पना से ही
जब हमारी आँखों के सामने
हमारा अपना 'स्नेह-पुल'
मात्र शब्दों के अभाव में, सिसकता हुआ
चरमरा कर दम तोड़ देगा !

प्रीति 'अज्ञात'

Friday, February 21, 2014

साया

तुम्हारी आहटों पर दिल किसी का, जब न धड़के 
तू परेशां हो इधर, और आँख वो उधर न फड़के 
न हो व्याकुलता, जो हर वक़्त पला करती थी 
न निगाहें रहीं, जो साथ चला करती थी. 
न हो ख़ुश्बू वो पहले सी, इन फ़िज़ाओं में 
न ही कोई नाम ले अब तेरा उन दुआओं में 
जहाँ मौजूदगी का तेरे, अब एहसास नहीं 
कोई दिखता तो है, पर फिर भी तेरे पास नहीं 
नही वो आसमाँ जिसमें सुकून रहता था 
वो जो तेरे लिए जीना जुनून कहता था 
न है अधिकार बाकी, न ही वो अब बात रही 
एक अंजान शख़्स सी ही तेरी जब बिसात रही 
गिरे आँसू इधर, और वहाँ अभिमान दिखे 
हरेक पल इस मोहब्बत का ये अपमान दिखे 
तो जान ले तू ए-दोस्त, वो प्यार तेरा नहीं 
तराशा था जो तूने ख्वाब, अब सुनहरा नहीं 
है ये क़िस्मत तेरी, पर दोषी इसका तू भी कहीं
चले जहाँ से थे, बस आज तुम खड़े हो वहीं 
हाँ, जिसका डर था, 'हादसा' वही अब हो गया है 
वो जो 'साया' था तेरा, भीड़ में अब खो गया है. 

प्रीति 'अज्ञात''

Wednesday, February 19, 2014

स्त्री और पुरुष

स्त्री और पुरुष
तराजू के दो पलड़े
लगते संतुलन बनाते
पर दूर हैं, खड़े

स्त्री के लिए पुरुष
उसकी ज़िंदगी
पुरुष से होती नहीं
ऐसी कोई बंदगी 

स्त्री के लिए प्रेम
उम्र-भर का वादा
पुरुष के लिए मात्र
प्राप्य का इरादा

स्त्री के लिए साथ
एक सुंदर अहसास
पुरुष के लिए घुटन
जब भी वो पास

स्त्री बोलती रहती है
कि पुरुष कुछ कहे
वो कुछ नहीं बोलता
ताकि स्त्री चुप ही रहे

स्त्री के लिए मौन
उसका अवसाद
पुरुष के लिए
टाला गया वाद-विवाद

स्त्री के लिए विवाह
रिश्ता जनम-जनम का
पुरुष के लिए प्रतिफल
उसके बुरे करम का

स्त्री की चाहत
छोटे-छोटे से पल
पुरुष की नज़रों में
व्यर्थ का कोलाहल

स्त्री बचपन से
सपनों की आदी
पुरुष जीता समाज बन
हरदम यथार्थवादी

प्रीति 'अज्ञात'

Monday, February 10, 2014

जान ले तू....

छुप रहा हैं क्यूँ अभी से, बादलों के पार तू
न हो रज़ा तो ढीठ बनके,कर दे अब इन्कार तू

दर्द का बहता समंदर, कश्ती न पतवार है
छोड़ दे लहरों में खुद को, कर जाएगा पार तू

पत्थरों के आगे झुक,हासिल कहाँ अब रोटियाँ
छीन ले उठकर इन्हें या,श्रद्धा का कर व्यापार तू

सीख ले सब दुनियादारी रस्मे-उल्फ़त कुछ नहीं
जीते-जी मर जाएगा, जो कर गया ऐतबार तू

दूर वो बूढ़ी सी आँखें, नम हो दुआएँ भेजतीं
ग़म को छुपा भीतर कहीं, लग जा गले से यार तू

लड़खड़ाते ही सही पर कुछ कदम अब शेष हैं
कोई तुझ बिन  मरेगा, देख बन के मज़ार तू

अजनबी चेहरों की महफ़िल में खुशी को ढूंढता
हादसा ऐसा हुआ कुछ, ख़ुद बन गया बाज़ार तू

तेरे ग़म पे हँसने वाले साथ में न रोएंगे
इतना ही काफ़ी समझ ले,रिश्तों का कारोबार तू

प्रीति 'अज्ञात'