Wednesday, February 19, 2014

स्त्री और पुरुष

स्त्री और पुरुष
तराजू के दो पलड़े
लगते संतुलन बनाते
पर दूर हैं, खड़े

स्त्री के लिए पुरुष
उसकी ज़िंदगी
पुरुष से होती नहीं
ऐसी कोई बंदगी 

स्त्री के लिए प्रेम
उम्र-भर का वादा
पुरुष के लिए मात्र
प्राप्य का इरादा

स्त्री के लिए साथ
एक सुंदर अहसास
पुरुष के लिए घुटन
जब भी वो पास

स्त्री बोलती रहती है
कि पुरुष कुछ कहे
वो कुछ नहीं बोलता
ताकि स्त्री चुप ही रहे

स्त्री के लिए मौन
उसका अवसाद
पुरुष के लिए
टाला गया वाद-विवाद

स्त्री के लिए विवाह
रिश्ता जनम-जनम का
पुरुष के लिए प्रतिफल
उसके बुरे करम का

स्त्री की चाहत
छोटे-छोटे से पल
पुरुष की नज़रों में
व्यर्थ का कोलाहल

स्त्री बचपन से
सपनों की आदी
पुरुष जीता समाज बन
हरदम यथार्थवादी

प्रीति 'अज्ञात'

9 comments:

  1. Replies
    1. शुक्रिया, राजीव जी !

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  2. बढ़िया अभिव्यक्ति है ! बधाई !!

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    1. धन्यवाद , सतीश जी !

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  3. सार्थक अभिव्यक्ति।
    फेसबुक का धन्यवाद आपके ब्लॉग का रास्ता दिखने के लिये।

    सादर

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    1. शुक्रिया, यशवंत जी !

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