Friday, March 22, 2019

गँवार लड़की

लड़की ढूँढ रही थी पानी
तलाश करते-करते 
पपड़ा चुके थे होंठ 
सूखता गला रेगिस्तान से रेतीले अंधड़ों से जूझते हुए
गटकने लगा स्वयं को  
पर फिर भी तैयार न था पराजय को 
इधर धरती पटी हुई थी कंक्रीट के पक्के विकास से
और लेनी पड़ी थी उदास माटी को विदाई  
वो चाहते हुए भी नहीं सोख पाई
बीती बारिश को 
होती आज तो अवश्य ही अपनी छाती से लगा 
बुझा देती हर नन्हे पौधे की प्यास 
पौधे जो एक दिन वृक्ष बन 
अपनी शाखाओं से आसमान तक पहुँच 
बादलों को बरसने का निमंत्रण दे सकते थे
वे बेचारे भ्रूण हत्या का शिकार हुए  
गाँव में हर तरफ सूखा मुँह लिए
लज्जित खड़े थे पोखर, नदी, तालाब, तलैयाँ 
लड़की जान चुकी थी कि 
आज भी घर में नहीं पकेगा खाना 
भोजन की उम्मीद में उसे भागना होगा
शहर की ओर
सुना है, शहर में सब मुमकिन है! 
यहाँ आधुनिकीकरण की होड़ ने 
भले ही रेत दिया है धरती का गला
पर पानी क़ैद है बोतलों में
खूब बिकता है औने-पौने दामों में  
उसे ख़रीदना होगा 
जीवन का मूल आधार 
गँवार लड़की कहाँ जानती है
अपने मौलिक अधिकार!
लड़की दौड़ रही है 
जैसे दौड़ा करती थी उसकी माँ  
और उसके पहले नानी 
-प्रीति 'अज्ञात'

#विश्व_जल_दिवस #World_Water_Day
Pic. Credit: Google

Wednesday, March 20, 2019

हमारी पहचान हैं त्योहार

होली न खेलने के सबके अपने सौ कारण हो सकते हैं. मेरे भी हैं. हाँ, मुझे तो इस दिन हमेशा ही लगता है कि धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊँ. यद्यपि गुजरात में इसका वो रंग देखने को नहीं मिलता जैसा कि बचपन से भिंड, ग्वालियर, आगरा, अलीगढ़, दिल्ली, लखनऊ, चंडीगढ़, बनारस, मिर्ज़ापुर में देखती आई हूँ. वहाँ तो अगर होली है तो लाख जुगत करके भी आप बच नहीं सकते! आपके अपने मित्र जयचंद बन जाते हैं. रंग-गुलाल की शिष्टता तो भूल ही जाइये, जब तक कीचड़ में न लोटाया या चेहरे पर सिल्वर पेंट न चिपकाया; वो भी कोई होली हुई! फिर भले ही अगले पंद्रह दिन तक कान के पास लगे रंग के न हटने के लिए दोस्तों को कोसते रहें, टीचर को सफाई दे-देकर थक जायें और दीवार-आँगन को साफ़ करते-करते घर की महिलाएँ 'नास जाए नासपीटों का!' कहकर उन लोगों को गालियाँ न दें..तब तक होली होती ही नहीं! ये सब त्योहार से उपजे सुन्दर भाव हैं तभी तो सब तरफ़ लाख़ रंग उड़ाने, बाल्टी भर-भर फेंकने और खूब शोर मचाने के बाद भी मीठी गुजिया की तश्तरी आपका स्वागत करती है. कही कढ़ी-चावल बनते हैं तो कहीं पुलाव, दहीबड़े से स्वाद कलिकाओं को तृप्त किया जाता है. पूरी-कचौरी तो आगे-पीछे बनना तय ही है. खाना-पीना, मस्ती और पुरानी बातों को भूलकर मेल-मिलाप यही इस देश के सभी त्योहारों का मूल भाव रहा है. यही हमारी पहचान भी है.
  
कहने का तात्पर्य यह है कि आप खेलें, न खेलें....ये आपकी मर्ज़ी है पर हर बात में इतिहास को मत कुरेदा कीजिये. हर पर्व के दिन ही उसकी बुराई क्यों करनी? इससे केवल और केवल नकारात्मकता फैलती है. ये साल के हर माह में पड़ने वाले त्योहार ही हैं जो प्रसन्न रहने के अवसर देते हैं. इस बहाने ही सही पर लोग एक-दूसरे से मिल तो लेते हैं! बधाई देने के लिए ही सही उन्हें अपने जीवित होने का एक सन्देश तो देते हैं! परिवार के साथ गुजारने को एक दिन तो मिल जाता है!

इन पर्वों का ज़िंदा रहना इसलिए भी आवश्यक है कि मनुष्यता शेष रहे! जब हम किसी अपने के गले लगते हैं तो वह जीवन का सबसे ख़ूबसूरत अनुभव और स्पर्श होता है. हमारे त्योहार इन पलों को हमारे जीवन में बिन जताये परोस देते हैं. वरना इस व्यस्त, गलाकाट, राजनीति और स्वार्थ से भरी दुनिया में किसके पास समय है! बल्कि अहसासों के साथ चलने वाले तो अब मूर्ख ही समझे जाने लगे हैं.

होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस, संक्रांति और कितने ही ऐसे त्योहार हैं, जो यदि न होते तो जीवन नीरसता और विकृतता से पूरी तरह भर गया होता. हम यूँ भी रोबोट की ज़िन्दग़ी जीने लगे हैं. ऐसे में हमें हमारी संस्कृति को गले लगा, उसे बाँहों में भर चलना ही होगा. हमारी भारतीयता की कहानी इन्हीं में शेष है और इसे जीवित रखना हम सबका उत्तरदायित्त्व है.
कहीं हिन्दू-मुस्लिम के फेर में फँसकर हम सब कुछ खो न बैठें! सत्ता और विपक्ष की रस्साकशी और सारी लगाई-बुझाई के बीच किसका भला हो पाया है पता नहीं! पर वैमनस्यता बढ़ती जा रही है. होली का शुभ अवसर है, ऐसे में सब कुछ भुलाकर जादू की झप्पी मारिये और जीने में सुक़ून के दो पल जोड़िये. सरकारें आनी-जानी हैं, ये हम और आप ही हैं जिन्हें साथ चलते रहना है. 😊
रंग और स्नेह भरी हर शुभकामना आप सबके लिए 💓
- प्रीति 'अज्ञात'
#होली #त्योहार

Tuesday, March 19, 2019

कई बार...

कई बार प्रेम तब होता है 
जब उसे नहीं होना चाहिए था 
इंसान जीता है व्यर्थ ही 
जबकि उसे मर जाना चाहिए था 
किसान हाथ जोड़ पूजता है रहनुमाओं को 
जबकि उनका कॉलर पकड़ खींच लेना चाहिए था 
स्त्री वर्षों बचाती है बिखरे रिश्ते को 
जबकि उसे पहले ही दिन बाहर निकल जाना चाहिए था 
लोग उम्र-भर ढकते हैं अपनी-अपनी कमियाँ 
जबकि उनमें सुधार या फिर उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए था 
उलझ जाते हैं सब खोखले शब्दों के मायाजाल में 
जबकि बहेलिए को दर्पण दिखाना चाहिए था 
रिश्ते, राजनीति, प्रेम या कि जीवन
जीतता आया है सबमें झूठ ही सदैव 
जबकि हर बार सच को सामने आना चाहिए था
सच को सामने आना ही चाहिए था
- कॉपीराइट © प्रीति 'अज्ञात'
तस्वीर: गूगल से साभार

Monday, March 11, 2019

ये दुनिया

दुनिया ये पागल सारी है
अपनों से हरदम हारी है 

छूटा शहर, गली, हर गाँव 
सफ़र अभी तक जारी है

जो आये, आकर लौट गए 
दिल उनका आभारी है 

सुख के बस ढलते किस्से हैं 
दुःख का हर पाँव भारी है  

पेड़, छाँव, छत खो बैठे 
जीवन की धूप क़रारी है

इश्क़, मुहब्बत, आशिक़, दिल 
सब मरने की तैयारी है
- © प्रीति 'अज्ञात'

Sunday, December 30, 2018

प्रेम

उसके दूर चले जाने पर भी मैं 
रत्ती भर नाराज़ नहीं हो सकी उससे 
हाँ, उम्मीद और विश्वास से भरे आसमान में  
अपना एक सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा
छिटकता हुआ देखा मैंनें 
और यह भी जाना कि 
अपने-आप को किसी के लिए 
उम्र भर समर्पित कर देने के बावजूद
मैं शायद....उसके लिहाज़ से
एक उम्दा प्रेमिका के खाँचे में 
अब तक फिट नहीं बैठ पाई हूँ 
तब टूटना, बिखरना और 
अपनी बेबसी पर घंटों रोना
मेरे इसी दुःख के साथी बने  
उस पल मैं चीखना चाहती थी जोरों से 
फोड़ देना चाहती थी उन क़िस्मतों का माथा 
जिसने मेरे प्रेम को मुझसे छीनने की 
बेधड़क, नाजायज़ गुस्ताख़ी की थी 
पर महसूसा कि कोई किसी को 
यूँ ही तो नहीं छीन सकता 
जब तक जाने वाले के मन में भी
चहकते नए भाव और नई उम्मीदें
 न उपजी हों
जानती हूँ, समझती हूँ  
प्रेम जबरन नहीं होता
तब ही तो अब, किसी भिक्षुक की तरह 
बार-बार आवाज देकर 
नहीं पुकारूँगी उसे 
नहीं झूलूँगी किसी भँवर में
बार-बार सिद्ध करने को अपनी सार्थकता 
यूँ भी प्रेम कहाँ कभी किसी की उपस्थिति का
मोहताज़ हुआ करता है
- प्रीति 'अज्ञात'

Monday, December 10, 2018

इन दिनों,

इन दिनों,
दिन है जैसे सूरज की फैली बाँहें
और रात चाँदनी की चादर ओढ़े हुए 
उनके आगोश में मौन हो सिमट जाना 
स्मृतियाँ हैं चुपचाप बहती नदी 
और उदासी उसमें घुप्प से घुस गया
भारी नुकीला पत्थर 
बीता समय उस ऊँचे पहाड़ की चोटी के पीछे 
खोया एक खरगोश है 
जो लौटकर आ ही न पाया कभी
निराशा है स्याह काजल भरा आकाश
और आँसू दुःख के बादलों में धँसी
ओस की पहली बूँद है कोई 
जो सुबह के रेशमी तकिये पर 
रोशनी का स्नेहिल स्पर्श पाकर 
ढुलक जाती है अनायास
स्वप्न..है दमित इच्छाओं की आतिशबाज़ी
उम्मीद...अलादीन का खोया चिराग़
और 'सुख' पुरानी पुस्तक में मिला 
करारा पाँच रुपये का नोट
- प्रीति 'अज्ञात'

Thursday, November 15, 2018

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उम्र के सिरहाने
कुछ ज़िंदा ख़्वाहिशें
रखीं थीं कभी 
गुज़रते वक़्त को झाँकती 
सिकुड़ती ख़्वाहिशों की बारादरी में
उम्र बढ़ती रही
और फिर यूँ भी हुआ
एक दिन अचानक 
कि सब कुछ...
...रीता ही ख़त्म हो गया
अब सिर्फ़ ख़ालिस रूह है
जो मरती नहीं 
दफ़न ख़्वाहिशें हैं
जो उमड़ती नहीं 
- प्रीति 'अज्ञात'