Wednesday, March 25, 2020

ये जीवन है!

दुनिया हक्की-बक्की है इन दिनों 
जैसे उड़ा दिए हैं रंग किसी ने 
खनकती सुबह की सबसे दुर्लभ तस्वीर के 
और पोत दिया है उस पर 
लम्बी अवसाद भरी रातों का सुन्न सन्नाटा 
हवा भी बुझे मन से बह रही है कुछ यूँ
जैसे बोझिल क़दमों से लौटते हैं  
लाश को दफ़नाते हुए निराश लोग 

चौड़ी चमकदार छःछः लेन वाली सड़कें 
जहाँ आगे निकल जाने की होड़ में 
पौ फटते ही एक-दूसरे को 
कुचल देने को तैयार था आदमी 
इन दिनों पड़ी हैं सुस्त, चुपचाप
जैसे घर के किसी कोने में 
प्रेम के दो मीठे बोल की 
बाट जोहता बैठा हो कोई उपेक्षित वृद्ध

हॉर्न की अनावश्यक चिल्लपों, 
वो गाड़ियों की बेधड़क आवाजाही 
ठसाठस भरी बसें 
और बच्चे को धकेलती-दौड़ाती
स्टॉप पर छोड़ने जाती माँ 
सब नदारद हैं दिन के सुनहरे कैनवास से
सामाजिक अट्टालिकाओं की ख़िसकती नींव तले 
धँस चुकी हैं मेल-मिलाप की सारी बातें
सशंकित हैं हर चेहरा 
और संवेदनाओं ने तो जैसे 
ओढ़ लिया है भय का 
किट्ट स्याह नक़ाब 

हर पल व्यस्ततता का रोना रोता 
दिन-रात शिक़वे-शिकायतें करता मनुष्य 
यही समय ही तो चाहता रहा अपने लिए सदैव
और आज जबकि उसके 
दोनों हाथों की मुट्ठियों में 
क़ैद हैं दिन के चारों पहर 
एन उसी वक़्त किसी ने
दबोच दी है उसकी हँसी

उधर विश्व की सारी महाशक्तियाँ
एक अदृश्य विषाणु के समक्ष 
ध्वस्त हो पड़ी हैं नतमस्तक 
इधर आँखों में भय की परिभाषा लिए
हर दिशा में औंधा गिरा आदमी
अकस्मात् तलाशने लगा है  
जीवन के नवीन  मूल्य
- प्रीति 'अज्ञात'

Friday, February 21, 2020

मोए का पतो....

पेड़ गिरा कें बिल्डिंग बन गईं
खाट झुपड़ियाँ संग उखड़ गईं
सांस घुटे ल्यो घामऊ  बढ़ गई
जे का भओ?

मोए का पतो... 

दो थे कमरा आठ जना जब
संग रहत थे खात-मिलत तब
चील बिलैया लड़त फिरें अब 
जे का है गओ?
मोए का पतो....

मौड़िन के सब पैर छुअत थे
नाम पे बिनके खूब भिड़त थे
लछमी घर की प्रेम करत थे
ओ मैया! अब का भओ?
मोए का पतो.....

चैये पैसा, पर काम न कत्त
पढ़ें न लिक्खें, हाथ में लट्ठ
देस का नाम तो है गओ सट्ट
जे का है गओ?
मोए का पतो.....

देस इकट्ठो पैले भओ थो
अंग्रेजन नों कूट दओ थो
बाके बाद धरम उग गओ थो
जे काय उग गओ?
मोए का पतो....

जितऊँ चिताओ आग बरत है
जात -पात  की हवा चलत है
जान की नेकऊ ना कीमत है
जे का कद्दओ?
मोए का पतो.... 

सिगरे एक दिना रोवेंगे 
का खावेंगे का पीवेंगे 
छाती पीट पछाड़ें लेंगें 
ओ दैया, फिर का होएगो? 
मोए का पतो.... 
मोए का पतो....😞
- कॉपीराइट © प्रीति 'अज्ञात'

Saturday, February 8, 2020

कवि

कवि पढ़ लेता है
वह सब भी
जो लिखा ही न गया कभी
कवि सुन लेता है
वह सब भी
जो कहा ही न गया कभी
जी लेता है तमाम अनकहे,
अलिखित,अपठित गद्यांशों में ही
सारी उम्र अपनी 
और एक दिन उन ख़्वाबों को  
कविता की तस्वीर दे 
कर देता है मुक़म्मल 
-प्रीति 'अज्ञात' 

कभी-कभी

कभी-कभी शब्द भी
छोड़ देते हैं
कवि का साथ
आते हुए प्रश्न
और उसके बाद की
गहरी चुप्पी संग
दबी अचकचाहट में
छुपा होता है उत्तर
क्या तुमने पढ़ी है कभी
मौन की परिभाषा?
-प्रीति 'अज्ञात' 

Sunday, November 17, 2019

राजा और प्रजा

लाशों के ढेर पर खड़े होकर 
राजा बजा रहा है शान्ति का बिगुल
भीड़ के शोरगुल में 
दबा दी गई है सच की आवाज 
छिपाये जा चुके हैं ख़ून से सने दस्ताने 
राजा जानता है कैसे मूर्ख बनती है प्रजा 
और कैसे बरग़लाया जा सकता है 
जन्मों से भूखी क़ौम को 
तभी तो डालकर रोटी के दो टुकड़े 
वो लगा देता है लेबल छप्पन भोग का 
धँसे पेट और चिपकी अंतड़ियाँ लिए लोग
टूट पड़ते हैं जीवन के लिए 
शुष्क गले और कृतज्ञ आँखों से 
लगाते हैं जयकारा 
'राजा महान है'
राजा सचमुच महान है 
तभी तो अशिक्षा और बेरोज़गारी के मस्तक पर 
धर्म का तिलक लगा 
बजवा रहा है अपने नाम का
चहुँदिश डंका 
राजा को बस यही सुनाई देता है 
राजा को बस यही दिखाई देता है 
बस यही राजा के मन की बात है 
कि उसने पकड़ ली है जनता की नब्ज़ 
और पाल रखे हैं चुनिंदा,अनपढ़ इतिहासकार 
जो कान घुमाते ही भारतीयता को धता बता 
गढ़ने लगते हैं मनमाफ़िक़ किस्से   

पुराने नामों पर नए मनमोहक मुलम्मे चढ़ा
सिद्ध होता है देशभक्ति का नया फॉर्मूला 
फिर चुनते हुए अपने महापुरुष 
ठोकी जाती है अहंकार की पीठ 
हुआँ हुआँ की ध्वनि से गूँजता है वातावरण 
और यकायक खिल उठते हैं आत्ममुग्धता से लबालब 
सारे स्वार्थी, मनहूस चेहरे

राजा की बंद आँखों को 
नहीं दिखतीं स्त्रियों की लुटती अस्मिता 
उसे नहीं सुनाई देते 
मासूम बच्चों के चीखते स्वर 
वो नहीं बताता बलात्कारियों को बचाने का सबब 
वो नहीं दिखाता बाल मजदूरों को 
उसे न देश की गरीबी दिखती है, न दुःख 
कहा न! राजा महान है! 
इसलिए प्रजा को भी नतमस्तक हो स्वीकारनी होगी 
उसकी महानता 

शान्ति के बाशिंदों और
अहिंसा के स्वघोषित पुजारियों ने 
डिज़ाइनर वस्त्र के भीतर की जेबों में 
सँभाल रखे हैं कई धारदार चाक़ू 
जिनसे रेता जायेगा वो हर एक गला
जो असहमति में हिलता नज़र आएगा 
जो सच बोलेगा,वही सबसे पहले मारा जायेगा

यूँ राजा अद्भुत नाटककार है प्रेम का
अपनी ग़लतियों को मौन के धागे से सिल
वो मुदित हो उँगलियों पर गिनाता है
दुश्मनों की कमियाँ 
विद्वेष और बदले की आग से भरी जा रहीं जेलें 
और अपराधियों से उसकी वही पहले सी साँठगाँठ है 
इन दिनों वो रच रहा वीरों की नई परिभाषा 
बता रहा क़ायरों को क्रांतिकारी 
क्यूँ न कहे वो ऐसा 
क्यूँ न लगे उसे ऐसा 
वह स्वयं भी तो इन्हीं आदर्शों को
जीता रहा वर्षों से 
पर तुम कुछ न कहना 
दोनों हाथों से ताली पीटते हुए 
चीखना जोरों से कि राजा अच्छा है
क्योंकि राजा कोई भी हो 
प्रजा को रोटी के साथ-साथ 
अपनी जान भी तो प्यारी है 
- प्रीति 'अज्ञात'(9/11/19)


Thursday, July 25, 2019

बलत्कृत औरतें


संस्कारी समाज में
बलत्कृत औरतें 
अब कभी नहीं कर सकतीं प्रेम 
कि भद्र प्रेमियों के लिए जुगुप्सा का कारण,
शर्म, अभिशाप का विषय है उनकी उपस्थिति
और विवश हो ढूँढनी पड़ती है इन सच्चे प्रेमियों को
हर माह इक नई देह  
अस्वीकृत है इन औरतों का खुलकर हँसना- बोलना
उस पर सामान्य रह,
लोगों के बीच दोबारा जीने की कोशिश? 
ओह! नितांत अभद्र है, अशिष्ट है, व्यभिचार है!
निर्लज्जता है, अश्लीलता है....अस्वीकार है!  
सुन रही हो न स्त्रियों!
वे कहते हैं...
तुम जैसों का जीना 
किसी वैश्या से भी कहीं ज्यादा दुश्वार है! 
कि बलत्कृत औरत का कोई हो ही नहीं सकता 
सिवाय छलनी देह और कुचली आत्मा के!
तो क्या हर बलत्कृत औरत को
उसके दोस्त, परिवार वालों और प्रेमी 
की तिरस्कृत निग़ाहों के 
तिल-तिल मार डालने से बहुत पहले
सारा स्नेह, ममता, मोह त्याग 
स्वतः ही मर जाना चाहिए सदैव? 
या फिर यूँ हो कि
न्याय की प्रतीक्षा कर गुज़र जाने से बेहतर 
किसी रोज़ वो भी 
पथरीले बीहड़ में छलाँग लगाए 
और फूलन बन जाए!  
- प्रीति 'अज्ञात'
#फूलन देवी, पैदा नहीं होती....समाज बनाता है!
तस्वीर: गूगल से साभार 

Thursday, June 27, 2019

स्त्री और प्रेम

जब भी लिखना चाहा प्रेम 
अचंभित हो पाँव पसारने लगी
अंतहीन उदासी
जब भी जीना चाहा प्रेम 
प्रतीक्षा जैसे ह्रदय पर जड़ें जमा 
लिपट गई अमरबेल की तरह
जब-जब आश्वस्ति होने लगी प्रेम पर 
तब-तब स्वयं को प्राथमिकता के 
सबसे निचले पायदान पर
दुविधा के रूप में ही खड़े पाया 
मेहंदी के सुर्ख पत्तों ने
स्वप्नों की नर्म क्यारियों में   
ज्यों ही रचानी चाही सूनी हथेली 
सारी रेखाएँ उसी क्षण 
उंगलियों से फिसल
दुर्भाग्य के हाथों अनाथ 
दम तोड़ती चली गईं 

नहीं लिखूँगी प्रेम 
नहीं जियूँगी प्रेम 
नहीं रंगनी ये हथेलियाँ भी
कि मरीचिका है प्रेम 
किसी रुदाली के स्वागत को 
बाँहें फैलाये आतुर
मायावी, शैतान बला है कोई  

अब मैं प्रतीक्षा की
सारी उदास चिट्ठियाँ
बेरहमी से हवा में उछाल
अपने ही सुरक्षित खोल में ठहर 
स्वयं ही बेदर्दी से कुरेद 
खरोंचने लगी हूँ
अपनी बची हुई लक़ीरें 
-प्रीति 'अज्ञात'