Friday, March 3, 2017

टूटा हुआ आदमी

टूटा हुआ आदमी 
प्रेम का मारा है
प्रेम में हारा है
डरता है लकीरों से 
और गुपचुप करता है प्रेम

टूटा हुआ आदमी
मुँह खोल के हँसता है
लिखता जीवन और 
ख़ुद सौ दफ़े
रोज़ाना मरता है 

टूटा हुआ आदमी
सूरज-सा सांझ-सवेरे 
डूबता, निकलता है 
थमा आसमां सबको 
दूर गहरे दरिया उतरता है

टूटा हुआ आदमी
सपने टूट जाने पर भी
नहीं हारता
टूटकर करता है प्रेम 
क़तरा-क़तरा बिखरता है
-प्रीति 'अज्ञात' 

Friday, February 24, 2017

समस्त गर्दभ प्रजाति की तरफ से इंसानों को समर्पित -

ये गदहे, ये खच्चर, ये घोड़ों की दुनिया 
ये इंसां से बेहतर निगोड़ों की दुनिया 
ये सूखे और रूखे निवालों की दुनिया 
ये दुनिया अगर चिढ़ भी जाये तो क्या है 

हरेक गदहा घायल, मिली घास बासी 
निगाहों में उम्मीद, दिलों में उबासी 
ये दुनिया है या कोई सूखी-सी खांसी
ये दुनिया अगर चिढ़ भी जाये तो क्या है

वहाँ गुंडागर्दी को कहते हैं मस्ती 
इस मस्ती ने लूटी है कितनों की बस्ती 
वहाँ चीटियों-सी है आदम की हस्ती
वो दुनिया अगर गिर भी जाये तो क्या है

वो दुनिया जहाँ ज़िंदगी कुछ नहीं है 
इज़्ज़त कुछ नहीं, भाषा कुछ नहीं है 
जहां इंसानियत की क़दर कुछ नहीं है
वो दुनिया अगर चिढ़ भी जाये तो क्या है

मिटा गालियों को, सँवारो ये दुनिया 
छोड़ अपराध, ईमां से चला लो ये दुनिया 
तुम्हारी है तुम ही बचा लो,ये दुनिया
बचा लो, बचा लो...बचा लो ये दुनिया 
ये दुनिया निखर के जो आये, तो क्या है!
ये दुनिया शिखर पे अब आये, तो क्या है!
- प्रीति 'अज्ञात'

(साहिर लुधियानवी साहब से क्षमा याचना सहित)

Friday, January 20, 2017

ज़िंदगी की किताब हूँ

मसरूफ़ियत की नुमाइशें 
फिज़ूल सब फ़रमाइशें 
तक़दीर के हाथों मिले 
हर दर्द में बेहिसाब हूँ
ज़िंदगी की किताब हूँ.... 

कौन किससे कब मिले 
सबके अलग हैं सिलसिले 
नीयत छुपा ले ऐब सब 
वो मुस्कुराता हिजाब हूँ 
ज़िंदगी की किताब हूँ..... 

ये दौर ही कुछ और है 
गिरगिट यहाँ सिरमौर है
उम्र के माथे पर चढ़ती 
ख्वाहिशों की खिजाब हूँ 
ज़िंदगी की किताब हूँ.....

चाहे ग़म हो या ख़ुशी कहीं 
मैं सबसे खुलके गले मिली
सुर्ख़ हँसी की चादर तान के 
ओढ़ी गई नक़ाब हूँ
ज़िंदगी की किताब हूँ.....
--प्रीति 'अज्ञात'

सभ्यता के नाम पर

मैं गले में फांस की तरह
अटका कोई शब्द हूँ
कैमरे के हर कोण से झांकती 
शेष हड्डी भी हो सकती हूँ, किसी की 
निरर्थक, अवांछित
पर फिर भी भुनाया जा सकता है जिसे!  

हूँ अपने ही घूर्णन से
नियमित दिन-रात बदलती
थकी-हारी धरा  
जिसका एक सूत भी
बहक जाना 
भीषण प्रलय का आह्वान होगा

मैं सभ्यता के अंतिम दौर की 
आखिरी पीढ़ी की 
दम तोड़ती उम्मीद हूँ
हौसलों को पुनर्जीवित करने में 
पराजित, निढाल, एकल श्वांस हूँ 
हाँ, मैंनें स्वीकार किया 
कि अच्छाई की समाप्ति 
बुराई के सतत प्रयासों का 
मिश्रित परिणाम है 
मैं आधुनिक से
आदि मानव बनने की प्रक्रिया का
निरीह प्रारंभिक काल हूँ
-प्रीति 'अज्ञात'

Wednesday, October 5, 2016

तुम्हारे मेरे बीच

तुम्हारे मेरे बीच
एक ख़्याल भर का 
स्वप्निल रिश्ता था  
जो सहलाता, दुलराता
जीने का प्रयोजन दिखाता  
'प्रयोजन' जो न था पहले जब 
जीवन तो तब भी था
तो अब क्यूँ है असहज 
सब कुछ 
तुम तब भी नहीं थे 
तुम अब भी नहीं हो 
तुम न होगे कभी

एक भ्रम जो
पलता रहा 
वर्षों से 
टूटा ऐसे, ज्यों 
शाख़ से जुड़ा पत्ता
उड़ता गया आँधी संग  
माला से बिंधा मोती
बिखरता रहा जमीं पर 
आकाश से बिछुड़ा तारा
विलुप्त हवाओं में

गहरे दुःख के साथ
क्षण भर देखा तो गया इन्हें
पर न आ सकी
इनके हिस्से
कभी कोई दुआ
न पीड़ा का हुआ बंटवारा
न मिला कोई भी जवाब 
बस अस्थियों की तरह
अंतिम समय में
चुन लिए गए
शोक-सभा में
नियमानुसार दोहराने को
वही चुनिंदा ख़्वाब
-प्रीति 'अज्ञात' 

Wednesday, September 28, 2016

हौसला बढ़ता गया

दोस्तों की दुश्मनी को माफ़ दिल से है किया
दिल पे जो गुजरी भुलाया हौसला बढ़ता गया
कौन किसका है यहाँ किसने गिराया आसमां 
भौंचक हुई आँखें मग़र फिर हौसला बढ़ता गया

हम थे अहमक़ मानके इक सीख ली आगे बढ़े 
याद की ग़लती जुबानी हौसला बढ़ता गया 
भीड़ के चेहरे में शामिल शख़्स हर गुमनाम है 
थाम के झंडा चले फिर हौसला बढ़ता गया

थी शिक़ायत रोज ही ज़ालिम जमाने से मगर 
ग़म को जब-जब भी तराशा हौसला बढ़ता गया
अपने काँधे गिरके रोये और जब हंसने लगे
मौत को दी पटखनी फिर हौसला बढ़ता गया
-प्रीति 'अज्ञात'

Monday, June 6, 2016

स्त्री

बचपन उनमें लूट रही हूँ
अपने सपने कूट रही हूँ 

कभी छुपी थी 
डर बैठी इक कोने में
कभी लिपट रोई संग
माँ के बिछौने में
गया समय ले साथ 
बीती बात सभी 
अब खुद से ही रूठ रही हूँ
अपने सपने.........
 
रिश्तों को अपनाया
जिया भरम ही था
आया हिस्से जो 
पिछला बुरा करम ही था 
है किससे क्या कहना
और किसकी ख़ातिर लड़ना
थोड़ा-थोड़ा टूट रही हूँ
अपने सपने......

वो जीवन भी क्या 
जो किश्तों में पाया
न समझी ये दुनिया 
है इसकी क्या माया
थी कोशिश पल भर
हंसकर जी लेने की 
भीतर ही खुद छूट रही हूँ
अपने सपने.......
- प्रीति 'अज्ञात'