Thursday, November 15, 2018

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उम्र के सिरहाने
कुछ ज़िंदा ख़्वाहिशें
रखीं थीं कभी 
गुज़रते वक़्त को झाँकती 
सिकुड़ती ख़्वाहिशों की बारादरी में
उम्र बढ़ती रही
और फिर यूँ भी हुआ
एक दिन अचानक 
कि सब कुछ...
...रीता ही ख़त्म हो गया
अब सिर्फ़ ख़ालिस रूह है
जो मरती नहीं 
दफ़न ख़्वाहिशें हैं
जो उमड़ती नहीं 
- प्रीति 'अज्ञात'

Sunday, September 30, 2018

पहचानती हूँ

चाल से, अंदाज़ से हर रंग इनका जानती हूँ 
रिश्तों के इन गिरगिटों को ख़ूब मैं पहचानती हूँ 

मंदिरो-मस्ज़िद में जाता जानकर मैं क्या करूँ 
आदमी दिल का भला हो इतना ही बस मानती हूँ 

लाल, केसरिया, हरे हों से मुझे मतलब नहीं 
झण्डा तो इक ही तिरंगा शान मेरी जानती हूँ 

ये अलग बस बात है कि बोलती अब कुछ नहीं 
लाख अच्छे का करो तुम ढोंग सब पहचानती हूँ 

क्या पता मैं कब मिलूँगी या मिलूँगी भी नहीं  
खोज में तेरी मग़र मैं खाक़ दर -दर छानती हूँ 

मेरे हाथों की लक़ीरें रोकती हैं अब मुझे 
टूटते तारे से जब कोई भी मन्नत माँगती हूँ 
- प्रीति 'अज्ञात'

Thursday, September 20, 2018

चले जाने के बाद

कवि के चले जाने के बाद 
शेष रह जाते हैं उसके शब्द
मन के किसी कोने को कुरेदते हुए 
चिंघाड़ती हैं भावनाएँ 
कवि की बातें, मुलाक़ातें 
और उससे जुड़े किस्से 
शब्द बन भटकते हैं इधर-उधर  
जैसे पुष्प के मुरझाने पर 
झुककर उदास हो जाता है वृन्त
जैसे उमस भर-भर मौसम 
घोंटता है बादलों का गला 
जैसे प्रिय खिलौने के टूट जाने पर 
रूठ जाता है बच्चा 
या कि बेटे के शहर चले जाने पर 
गाँव में झुँझलाती फिरती है माँ
वैसे ही हाल में होते हैं 
कुछ बचे हुए लोग 
पर जैसे थकाहारा सूरज 
साँझ ढले उतर जाता है नदी में 
एक दिन अचानक वैसे ही
चला जाता है कवि भी 
हाँ, उसके शब्द नहीं मरते कभी 
वे जीवित हो उठते हैं प्रतिदिन 
खिलती अरुणिमा की तरह 
- प्रीति 'अज्ञात'
(Image: Gavin Trafford)

Tuesday, July 24, 2018

हे राम!

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट 
जो बंदा मन की करे उसे पकड़कर कूट 
उसे पकड़कर कूट तू ऐसा मानवता शरमाये 
थर-थर बोलें लोग यही हाय नंबर न लग जाये

तुम स्वामी, तुम अन्तर्यामी ये तुमरा ही देस 
बाक़ी चोर, उचक्के ठहरे बदल-बदल कर भेस 
तुमको तुम्हीं मुबारक़, हाँ दिखलाओ अपनी शक्ति 
राम प्रकट होंगे जिस दिन बतलाना अपनी भक्ति

कहना उनके नाम पर क्या क्या न किया है तुमने 
अपनी ही माटी को छलकर रौंद दिया है तुमने
फिर रोना छाती पीट-पीट, दुःख दुनिया के तर जाएँगे
पर तुमरी गाथा तुमसे सुन वो जीते जी मर जाएँगे
- प्रीति 'अज्ञात'
#राम_का_नाम_बदनाम_न_करो  

रामराज्य

आसाराम करें आराम, जय श्री राम, जय श्री राम
राम-रहीम बिगाड़ें काम, जय श्री राम, जय श्री राम 
राधे माँ छलकते जाम, जय श्री राम, जय श्री राम
जेल भई अब चारों धाम, जय श्री राम, जय श्री राम 

मारा-कूटी, गिरे धड़ाम, जय श्री राम, जय श्री राम
बाढ़ में डूबे हाय राम, जय श्री राम, जय श्री राम
मुग़ल विदा सब बदले नाम, जय श्री राम, जय श्री राम
मंदिर-मस्ज़िद भये बदनाम, जय श्री राम, जय श्री राम
-प्रीति 'अज्ञात'
#रामराज्य #सहिष्णु_भारत 

Saturday, July 21, 2018

सब बढ़िया है

तुम्हारी हँसी 
जीवन की उस तस्वीर जैसी है 
जिसमें उम्र के तमाम अनुभव 
होठों पर जमकर खिलखिलाते हैं 
और फिर हँसते-हँसते अनायास ही 
मौन हो सूनी आँखों से 
एकटक देखते जाना 
दर्द की सारी परतों को 
जैसे जड़ से उधेड़कर रख देता है 
समय के साथ हम कितना कुछ सीख जाते हैं न!
मर-मर कर जीना 
या कि जीते जी मर जाना
स्वप्न को जीवित ही गाड़ 
इन आँखों का पत्थर हो जाना
और हँसते हुए दुनिया से हर रोज कहना 
सब बढ़िया है
- प्रीति 'अज्ञात'