Wednesday, July 2, 2014

बेवजह :P :D

'जीवन' लगभग एक सा ही है सबका, 
सुख-दुख भी आ ही धमकते हैं
बिन-बुलाए मेहमान-से
न तो सुख में दो रोटी अधिक
खाई जाती हैं
और न ही दुख से कोई
भूखों मरता है !
चलती है, जिंदगी अपनी ही गति से
थकान, परेशानी, बीमारी 
सब आते हैं बारी-बारी
बनते हैं, अवरोधक भी
पर मिलो गले सबसे
उसी उत्साह से !
और याद रखो अपनी ज़िम्मेदारियाँ 
जो न सिर्फ़ कारण
बल्कि उम्मीद भी देती हैं
पुन: उसी स्फूर्ति से
काम पे जुट जाने की
न जाने कितनी ही वजहें हैं
हर रोज जीने की
मुस्कुराने की
और बावरे-से इस
'मन' को धमकाने, समझाने की
समझे क्या ?
उम्मीद की किरण को
मारो गोली
'ज़िंदगी मिली ना
बहुत है, अब बस
चुपचाप से 'जी' जाने की ! :) :)

अब पोस्ट पढ़ ही रहे हैं, तो अंत में ये चीपो भी झेलना ही होगा -
सोच को शब्दों में ढालना आसान नहीं होता
हर 'सूरमा भोपाली' पहलवान नहीं होता ! :P :D
- प्रीति 'अज्ञात'

12 comments:

  1. सही ढाला है -चलने का नाम जिंदगी है

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    1. जी, अरविंद जी ! शुक्रिया !

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  2. बहुत सही ...जीवन है यही

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    1. आभार, मोनिका जी !

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  3. हाँ ये तो है ,पर फिर बात उठती है - आगे क्या ?

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    1. फिर क्या, दोगुने उत्साह के साथ संघर्ष से जूझना है :) मुस्कुराने से जीवन आसान कहाँ होता है, बस महसूस होता है ! शुक्रिया, प्रतिभा जी !

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    1. धन्यवाद, शालिनी जी !

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  5. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@दर्द दिलों के
    नयी पोस्ट@बड़ी दूर से आये हैं

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    1. आभार, प्रसन्ना जी !

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  6. वाह! बहुत बढ़िया कहा है..

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    1. धन्यवाद, अमृता जी !

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