Thursday, September 20, 2018

चले जाने के बाद

कवि के चले जाने के बाद 
शेष रह जाते हैं उसके शब्द
मन के किसी कोने को कुरेदते हुए 
चिंघाड़ती हैं भावनाएँ 
कवि की बातें, मुलाक़ातें 
और उससे जुड़े किस्से 
शब्द बन भटकते हैं इधर-उधर  
जैसे पुष्प के मुरझाने पर 
झुककर उदास हो जाता है वृन्त
जैसे उमस भर-भर मौसम 
घोंटता है बादलों का गला 
जैसे प्रिय खिलौने के टूट जाने पर 
रूठ जाता है बच्चा 
या कि बेटे के शहर चले जाने पर 
गाँव में झुँझलाती फिरती है माँ
वैसे ही हाल में होते हैं 
कुछ बचे हुए लोग 
पर जैसे थकाहारा सूरज 
साँझ ढले उतर जाता है नदी में 
एक दिन अचानक वैसे ही
चला जाता है कवि भी 
हाँ, उसके शब्द नहीं मरते कभी 
वे जीवित हो उठते हैं प्रतिदिन 
खिलती अरुणिमा की तरह 
- प्रीति 'अज्ञात'
(Image: Gavin Trafford)

Tuesday, July 24, 2018

हे राम!

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट 
जो बंदा मन की करे उसे पकड़कर कूट 
उसे पकड़कर कूट तू ऐसा मानवता शरमाये 
थर-थर बोलें लोग यही हाय नंबर न लग जाये

तुम स्वामी, तुम अन्तर्यामी ये तुमरा ही देस 
बाक़ी चोर, उचक्के ठहरे बदल-बदल कर भेस 
तुमको तुम्हीं मुबारक़, हाँ दिखलाओ अपनी शक्ति 
राम प्रकट होंगे जिस दिन बतलाना अपनी भक्ति

कहना उनके नाम पर क्या क्या न किया है तुमने 
अपनी ही माटी को छलकर रौंद दिया है तुमने
फिर रोना छाती पीट-पीट, दुःख दुनिया के तर जाएँगे
पर तुमरी गाथा तुमसे सुन वो जीते जी मर जाएँगे
- प्रीति 'अज्ञात'
#राम_का_नाम_बदनाम_न_करो  

रामराज्य

आसाराम करें आराम, जय श्री राम, जय श्री राम
राम-रहीम बिगाड़ें काम, जय श्री राम, जय श्री राम 
राधे माँ छलकते जाम, जय श्री राम, जय श्री राम
जेल भई अब चारों धाम, जय श्री राम, जय श्री राम 

मारा-कूटी, गिरे धड़ाम, जय श्री राम, जय श्री राम
बाढ़ में डूबे हाय राम, जय श्री राम, जय श्री राम
मुग़ल विदा सब बदले नाम, जय श्री राम, जय श्री राम
मंदिर-मस्ज़िद भये बदनाम, जय श्री राम, जय श्री राम
-प्रीति 'अज्ञात'
#रामराज्य #सहिष्णु_भारत 

Saturday, July 21, 2018

सब बढ़िया है

तुम्हारी हँसी 
जीवन की उस तस्वीर जैसी है 
जिसमें उम्र के तमाम अनुभव 
होठों पर जमकर खिलखिलाते हैं 
और फिर हँसते-हँसते अनायास ही 
मौन हो सूनी आँखों से 
एकटक देखते जाना 
दर्द की सारी परतों को 
जैसे जड़ से उधेड़कर रख देता है 
समय के साथ हम कितना कुछ सीख जाते हैं न!
मर-मर कर जीना 
या कि जीते जी मर जाना
स्वप्न को जीवित ही गाड़ 
इन आँखों का पत्थर हो जाना
और हँसते हुए दुनिया से हर रोज कहना 
सब बढ़िया है
- प्रीति 'अज्ञात'

Wednesday, July 4, 2018

प्रतीक्षा

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है
जो घटित होते ही रोप देता है 
दुःख के तमाम बीज  
स्मृतियों की अनवरत आवाजाही के मध्यांतर में 
पनपती हैं चहकती सैकड़ों तस्वीरें
और किसी चलचित्र की तरह 
जीना होता है उन्हें मौन, स्थिर बैठकर

बादलों के उस पार से 
सुनाई देती है अब भी 
नन्हे क़दमों की आहट
तीर से चले आने की 
होती है सुखद अनुभूति किसी के
धप्प से लिपट जाने की 
आती है ध्वनि कि जैसे उसने 
पुकारा हो बिल्कुल अभी 
और ठीक तभी ही 
फैला हुआ सन्नाटा
सारे भ्रम को चकनाचूर कर  
किसी अनवरत नदी-सा 
प्रवाहित होने लगता है कोरों से

है कैसी विडम्बना
कितना क्रूर है ये नियम 
कि भीषण वेदना, अथाह दुःख के सागर में 
सारी संभावनाओं के समाप्त हो जाने पर भी 
रुकती नहीं समय की गति  
चलायमान रहता है जीवन 
ठीक वैसे ही 
जैसे कि हुआ करता था
किसी की उपस्थिति में

पर न जाने क्यूँ फिर भी 
उम्मीद की खिड़की पर 
बरबस टंग जाती हैं आँखें 
और प्रतीक्षा के द्वार 
अंत तक खुले रहते हैं....
 - प्रीति 'अज्ञात'

Thursday, May 10, 2018

यूँ ही ...

चलो इस तरह भी जिया जाए 
ख़्वाब को साथ न लिया जाए 

ग़म की औक़ात कुछ नहीं रहती 
घूँट तबस्सुम से जो पिया जाए 

अपनी ख़ातिर ही जीना क्या जीना
ग़ैरों के लिए कुछ तो किया जाए

मुल्क़ से इश्क़ भी इबादत है 
क़र्ज़ इसका चुका दिया जाए 

गिला ज़माने से कब तक करना 
अपने ज़ख्मों को ख़ुद सिया जाए

नफ़रतों का कुछ नहीं हासिल 
चलो इंसान बन जिया जाए 
- © प्रीति 'अज्ञात'

Friday, May 4, 2018

Breast-cancer

मेरे कितने अपने चेहरे
जिन्हें लील लिया है तुमने 
और वो भी जिनकी उपस्थिति 
अब भी जीने की आस फूँकती है मुझमें 
हर बार ही गुजरी हूँ क़रीब से 
उनकी असहनीय पीड़ा में    
देखा है बेबस आँखों ने  
मातृत्व के झरने को कटते हुए 
जैसे कोई बहता हुआ सोता 
दूर कर दिया गया हो अचानक  
अपनी उद्गम-स्थली से 

तुम्हारी विशाल बहुगुणित कोशिकाओं का 
निवारण ही एकमात्र किस्सा नहीं है, विज्ञान का 
यह मांस-पेशियों को निर्ममता से कुरेदता
सम्पूर्ण जीवन-दर्शन है  
जिसके दर्द की शिराएँ नहीं होती
किसी एक हिस्से तक ही सीमित 
काले घने केशों का पतझड़ और 
उभारों का देह में ही 
धप्प-से विलुप्त हो जाना
तो बस......... 
बाहरी बातें भर हैं, पर 
दुःख के दरिया को भीतर तक
मसल-मसल घोंटती है यह प्रक्रिया

जाता है हाथ स्वत: ही उस विलीन भाग पर
हृदय बिलखता है चीख-चीखकर
और लाख ना-नुकुर के बाद भी
बंजर हुई भूमि पर 
सिलिकॉन की छोटी गद्दियाँ 
बना ही लेती हैं अपना आशियाना

यूँ भी होता है उसके बाद कभी कि 
रंगीन स्कार्फ़ की छाँव तले 
घुँघराले नन्हे बालों की आमद देख 
एक बहादुर स्त्री दर्पण में फिर मुस्कुराती है
सँभालने लगती है अपना बसेरा   
उम्मीद के मसनद पर टिका जीवन
कभी ठहरता, तो कभी चलता है अनवरत
इधर बच्चों की सपनीली दुनिया में 
अठखेलियाँ करता है चमचमाता भरोसा 
कि माँ अभी जीवित है!
- प्रीति 'अज्ञात'
#Breast-cancer