Thursday, January 4, 2018

जी, साब जी

जैसे ही नेता जी चीखे 
अफसर बोले आया जी 
युग बीते हैं इन चरणों में
पर गले नहीं लगाया जी 

तुम जात-पांत के खेला में 
हाय हमको दद्दा भूल गए 
जान निछावर करके हारे 
कुछ भी न हमने पाया जी 

हम मां-बाबा के इकलौते थे 
और जी-जान से पढ़ते थे 
तुम लड़ते संसद में जैसे 
वैसे घर पर भी न करते थे 

अरे, राजा हो या प्यादा हो
पर भाषा की मर्यादा हो
मत भूलो सम्मान किसी का
शिक्षा ने सिखलाया जी

पर राजनीति की कीचड़ ऐसी 
अच्छा-बुरा बराबर है
जिसका, जितना खेल भयंकर 
वही हुआ कद्दावर है 

देशप्रेम की ख़ातिर हमने 
किस्सा ये समझाया जी 
पीर हिया की बाहर निकली 
मन को हल्का पाया जी  
 - © प्रीति 'अज्ञात'

Friday, December 29, 2017

उदासी का रंग

उदासी भी कभी-कभी 
बड़े अपनेपन से
करती है गलबहियाँ 
भरते है रंग इसमें  
सूखे हुए फूल 
पीले पड़े पत्ते 
कमजोर, शुष्क,
बेजान टहनियाँ 
समंदर में डूबती-उतराती 
किनारों से टक्कर खाती  
निराश लौटती लहरें 
वहीं कहीं पार्श्व से बजती 
जगजीत की जादुई आवाज 
'कोई ये कैसे बताए...!'
और ठीक तभी ही
समुंदर में स्वयं ही 
डूब जाने को तैयार
 थका-हारा लाल सूरज
सब संदेशे हैं 
नारंगी-बैंगनी और फिर 
यकायक स्याह होते आसमान के 
कि उदासी भी एक रंग है 
ओढ़ा हुआ-सा 
- प्रीति 'अज्ञात'

Tuesday, December 19, 2017

अंतिम कवि

उस पल जब होगा आगमन प्रलय का 
और विलीन हो जाएगी ये दुनिया
तब भी शेष रह जाएगा
कहीं कोई कवि 
ढूंढता हुआ
अपनी तमाम प्रेम कविताओं में 
जीवन की ग़ुलाबी रंगत
बदहवास हो तलाशेगा 
उजाड़ हुई बगिया में 
मोगरे की खोई सुगंध  
निष्प्राण वृक्षों के क्षत-विक्षत घोंसलों में
बेसुध पड़े पक्षियों का कलरव  
टहनियों में अटकी 
रंग-बिरंगी तितलियों की लुप्त चंचलता 

वह उस दिन विकल हो
निर्जन, सुनसान सड़कों पर
हाथ में थामे जलती मशाल
नंगे पैर चीखता हुआ दौड़ेगा
ढूंढेगा उसी समाज को 
जिसके विरुद्ध लिखता रहा उम्र भर 
अपनी ही आँखों के समक्ष देखेगा
संभावनाओं का खंडित अम्बर 
भयाक्रांत चेहरे से उठाएगा 
उस रोज का अख़बार 
जिसका प्रत्येक पृष्ठ 
अंततः रीता ही पाएगा 

श्रांत ह्रदय से टुकुर -टुकुर निहारेगा 
सूरज की डूबती छटा
और फिर वहीं कहीं
अभिलाषा की माटी में रोप देगा
जीवन की नई परिभाषा  
कर लेगा मृत्यु-वरण 
उसी चिर-परिचित आह के साथ
लेकिन जो जीवित रहा तब भी
तो अबकी बार 
चाँद की ओर पीठ करके बैठेगा 
- © प्रीति 'अज्ञात' 2017


Tuesday, October 31, 2017

प्रेमिकाएँ

प्रेम में हारी हुई स्त्रियाँ 
प्रेम नहीं 
प्रेमी से हार जाती हैं 
प्रेमी जो न समझ सका 
उसके प्रेम को 
प्रेमी जिसके लिए 
प्रेम बस उसके 
एकांत और सुविधा का साथी रहा 
प्रेमी जिसे अपने ही सुख-दुःख से
होता रहा वास्ता 

उनकी प्रेमिकाएँ बांटती रहीं उनके सारे दुःख 
हंसती रहीं उनके सुख में 
साझा किया जीवन का हर रंग उनका
हर दुआ में लेती रहीं उनका ही नाम 
पर उन स्त्रियों के हिस्से 
फिर भी न आया प्रेम 
उसके नाम पर जो सौगात मिलती रही   
उसमें कुछ सवाल थे 
कुछ आक्षेप 
कुछ मजबूरियाँ
और शेष 
पुरुषवादी सोच के दंभ में डूबा
मालिकाना हक़

प्रेम कहीं भी नहीं था कभी 
और जब-जब तलाशा
खंगाला गया इसे 
रिश्तों की उखड्ती
तमाम शुष्क पपड़ियों के बीच 
हर बार 
छूटे छोर के  
अनगिनत टूटे हिस्सों को
खिसियानी गांठों से ढकती-जोड़ती
बदहवास-पगली 
स्त्री ही नज़र आई

छद्म प्रेम में
टूटती-बिखरती वही स्त्री
अब तक डूबी हुई है 
उसी प्रेम में
जो दरअसल उसके हिस्से 
कभी था ही नहीं!
- प्रीति 'अज्ञात'

Saturday, July 1, 2017

बात अभी खुली नहीं!

सुना है सलीम चाचा ने कल
अपनी प्रेस की दुकान जल्दी बंद कर  
ख़ूब जलेबियाँ खाईं
काम वाली कजरी भी 
रात से दिया-बाती करे बैठी है 
इधर सब्जी बेचने वाला चंदू भी 
सूरज से पहले ढेला भर तरकारी ले आया
स्वयं से दोगुने बोझ को ढोते हुए भी 
कल्लू मजदूर आज मुस्कुरा रहा
सफाई वाली काकी ने भी 
अँधेरे ही सारा कचरा जला 
सबकी सुबह रोशन कर दी 
ये सारे और इनसे कई 
रात भर जश्न में रहे
उधर चौराहों पर कई लोग 
अब तक मुँह फुलाए 
धरना दिए बैठे हैं 
भोली समझ का फेर 
या नासमझी का अनशन
बात अभी ठीक से खुली नहीं!
- प्रीति 'अज्ञात'  कॉपीराइट © 2017

दिया जलाओ!

लग रहा जैसे राजा राम 
आज अयोध्या लौटे हैं 
या फिर कृष्ण जन्मोत्सव की 
मधुर धुन है कोई
है पाण्डवों का शंखनाद,
न-न, अशोक अब चक्रवर्ती हुआ!

चन्द्रगुप्त मौर्य, शिवाजी, अकबर, 

पृथ्वीराज और महाराणा प्रताप भी 
इतिहास के पन्नों पर परस्पर हाथ थामे 
बैठे हैं हैरत में, श्वांस रोके हुए  
कि अब एक नया सुनहरा पृष्ठ
जुड़ने वाला है
स्वतंत्रता सेनानियों ने भी दी है
पूरे बयालीस तोपों की सलामी
   
ये 'दीन-ए -इलाही' सा आगाज़ है
सरगम का सुरीला साज है 
कि गंगोत्री से निस्सरित 
पवित्र गंगा अब दूधिया हो चली
ताजमहल की चमक से चुँधिया रही आँखें
अचानक सारी ऊंची इमारतें हरियाते
जंगलों का रूप धरने लगीं
विलुप्त प्राणी पुनर्जीवित हुए 
वातावरण सुगन्धित हो महक रहा
बचपन की खोई मासूमियत लौट आई 
और स्त्री प्रजाति भयमुक्त है 
उमंगें हैं, खुशहाली है 
बेमौसम दीवाली है 
दिया जलाओ....दिया जलाओ!
कि आपको साक्षी होने का पुण्य मिला!
- प्रीति 'अज्ञात'  कॉपीराइट © 2017

Tuesday, June 13, 2017

मील के पत्थर

मेरी तुम्हारी मुलाक़ात के बीच
शहरों की दूरियाँ भर ही न थीं
एकमात्र अड़चन  
बल्कि हमने ही 
हर इक मील के पत्थर पर 
सैकड़ों प्रश्न बिठा रखे थे 
हम मोड़ पर खड़े चेहरों की
तसल्लियाँ चाहते थे
हम चाहते थे कि जब हम मिलें 
तो दोनों के मन पर 
कोई बोझ न हो कभी 
....और फिर हम कभी मिल ही न सके

मील के पत्थर उम्र भर हमारी 
और हम उनकी राह तकते रहे 
बीच के सारे प्रश्न
तमाम बेड़ियों में जकड़े 
विवश, अनुत्तरित, श्रृंखलाबद्ध खड़े थे 
वो चेहरे, जिनकी तसल्लियों पर
हमने सब क़ुर्बान किया 
अब भी नाख़ुश हैं
वो सुख जिसे सबको बाँटने के फेर में 
हम दुःखों की गठरी बनते रहे
अब भी उसका तानाबाना उधेड़ 
तमाचे की तरह जड़ दिया जाता है
हमारे ही चेहरों पर  
कौन जाने क्यों देनी होती है
इच्छाओं की तिलांजलि
मिले हैं भला कभी
सारे प्रश्नों के उत्तर??
दिल पर मनों बोझ अब भी है......! 
- प्रीति 'अज्ञात'