Tuesday, October 27, 2015

माँ कहतीं थीं.....

समय रहते माँ की सीख, समझ लेनी चाहिए! एक रचना, हर आयु की स्त्री को समर्पित -

माँ हरदम कहतीं 
दुनिया उतनी अच्छी नहीं 
जितनी तुम माने बैठी हो 
और मैं तुरत ही 
चार अच्छे दोस्तों के नाम 
गिना दिया करती

माँ ये भी समझातीं 
हरेक पे झट से विश्वास न करो 
जांचो-परखो, फिर आगे बढ़ो 
और मैं उन्हें शक्की मान  
रूठ जाया करती 

माँ आगे बतातीं 
आँखों की गंदगी पढ़ना 
किताबों में नहीं लिखा होता 
मैं फिर भी उन पन्नों में घुस 
बेफ़िज़ूल ख़्वाब सजाया करती

माँ थकने लगीं, ये कहते हुए 
तेरी चिंता है बेटा 
औ' जमाने का डर भी 
यूँ भी तुम्हारा बचपना जाता ही नहीं 
मैं जीभ निकाल, खी-खी 
हंस दिया करती
कि जाओ मैं बड़ी होऊंगी ही न कभी 

इन दिनों मैं 
हैराँ, परेशां भटकती 
अपने ही देश में 
अपनी बेटी का हाथ 
कस के थामे
देखती हूँ आतंक 
दीवारों की चीखों का
भयभीत हूँ 
इर्दगिर्द घूमते 
काले सायों से

दिखने लगे  
लाशों के ढेर पर बैठे 
सफेदपोश, मक्कार  चेहरे 
जिनके लिए है ये मात्र 'घटना'
खुद पर घटित न होने तक 
सुबक पढ़ती हूँ अचानक 
और मनाती हूँ मातम 
अपने 'होने' का 

माँ, तुम ठीक ही कहतीं थीं हमेशा 
सामान्य तौर पर 
यही तो सच है, इस समाज का 
तुमने 'दुनिया' देखी थी
और मैं अपवादों को 
अपनी 'सारी दुनिया' मान 
सीने से लगाए बैठी थी 

देखो न, अब मैं भी  
दोहराने लगीं हूँ यही सब 
अपनी ही बेटी के साथ
सीख गई हूँ बड़बड़ाना,
औ' हँसते-हँसते रो देना
समाचारों को देख
खीजती-चीखती भी हूँ  
पागलपन की हद तक!

माँ आजकल, कुछ नहीं कहतीं 
बस, उदास चेहरा लिए 
हैरानगी से देखतीं है मुझे!
- © 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, October 20, 2015

'अंत भला तो सब भला'

सोचती हूँ
एक दिन, 
खुद ही, नोच लूँ 
बोटी-बोटी अपनी 
और भिजवा दूँ 
सारे चील-कौवों को 
पाऊँ मुक्ति 
स्त्री-देह के 
अभिशाप से 

 न मरूँगी रोज फिर 
उन गन्दी निगाहों से 
हर घिनौने स्पर्श का 
अब घोंट दूंगी  
मैं ही गला 
क्या विश्वास, 
कैसी मर्यादा 
हर राह यहाँ 
किसी ने 
अपना बन 
ही छला
 
हाँ, तुम जीत जाओगे 
अपने पौरुष के अभिमान से
करोगे चर्चा, अपने हुनर की
स्त्रियों के बेधड़क अपमान से 
ये दुनिया तुम्हारी 
तुमसे और भी
कितने हैं बाक़ी 
इधर एक अकेली स्त्री
जिसके, ज़िंदगी और मौत के 
क्या  हैं मानी
सुना है न 
'अंत भला तो सब भला'
- प्रीति 'अज्ञात'

** ये रचना आत्महत्या की प्रवृत्ति का समर्थन नहीं करती बल्कि उन पुरुषों के लिए एक 'सोच' पैदा करने की उम्मीद है. जो स्त्री (बच्ची को भी) को 'देह' के अतिरिक्त देख ही नहीं पाते. वे ये कैसे भूल जाते हैं कि उन्होंने एक स्त्री की कोख से ही जन्म लिया है, जिसे वो आज 'माँ' कहते हैं. एक बहिन भी होगी उन घरों में, पत्नी/प्रेमिका और बेटी भी हो सकती है. ये पैग़ाम आपकी 'माँ', आपकी 'पत्नी', आपकी प्रेमिका, आपकी 'बेटी' की तरफ से है, आपके लिए. किसी पर अपनी गंदी निगाहें डालने से पहले एक बार उनके चेहरे जरूर याद कर लीजियेगा. यूँ ये अपराध ख़त्म होने की उम्मीद बिलकुल भी नहीं, जिन्हें सजा का कोई डर नहीं वो दूसरों को और भी भयभीत करते हैं.
- प्रीति 'अज्ञात'

Friday, October 2, 2015

झकास!

कहा था उसने
बरसों पहले कि  
एक तमाचे के पड़ते ही
बढ़ा देना दूसरा गाल 
न करना हिंसा का समर्थन
भूलकर भी कभी 
थामे रहना हमेशा
सच्चाई का दामन 
बदलते दौर और
लुप्त होती इंसानियत के बीच
कितना मुश्किल है
'गाँधी' सा होना

पर पलटकर एक और
प्रहार करने से भी
हासिल क्या ?
बढ़ती रहेंगी लड़ाइयाँ
होंगे आरोप-प्रत्यारोप
समाधान तो फिर भी न
निकल सकेगा!
और जो थामा, तुमने
झूठ का दामन
तो खुद ही सोचो
कैसे बुनोगे
रोज एक नई कहानी
'असत्य' की ?

'सत्य' तो यूँ भी
तय है, उज़ागर होना 
तो क्यूँ न बदल लें
हम विरोध के तरीके
और शर्मिंदा होने दें
उन्हें खुद ही अपने
हर गलत कृत्य पर

हाँ, कर लिया है प्रण
गहरा फिर इस बार
होगा बस
गाँधीगिरी का ही वार
यही मेरा विश्वास है
यही सबसे ख़ास है
है दिखने में छोटा
थोड़ा कमजोर ही सही
पर यक़ीन है, अब भी
उतना ही, पहले-सा 
वो आदमी 'झकास' है !
-प्रीति 'अज्ञात'

Thursday, October 1, 2015

सुनो, भगवान.....

सुनो, भगवान...
आज भी वही हुआ
जो होता आया है
अब इन बातों से
ज्यादा हैरानी नहीं होती
हाँ, होता है मन उदास
कुछेक आँसू भी
अनायास ढुलक पड़ते हैं
मुट्ठियां भिंचती हैं
बेवकूफ़ कलेजा भी 
मुँह को आता है
रुंधता है गला
एक-दो दिन 
और फिर वही दिनचर्या
सब कुछ सामान्य
सच,'इंसानी जीवन' कितना
सस्ता हो चला है यहाँ

पता ही होगा न तुम्हें तो 
तुम्हारी ही बनाई दुनिया जो है
यहाँ तुमसे ज़रूरी कुछ भी नहीं
तुम्हारे अलग-अलग 
नामों की आड़ में
और उन्हीं नामों से बनी
पूजनीय किताबों में
होता है तुम्हारा ख़ूब ज़िक्र
कि तुम ये कर सकते
तुम वो कर सकते
तुम सर्वदृष्टा,
तुम सर्वज्ञानी,
तुम पालनहारा,
जग अज्ञानी 
तुम निर्माता
तुम दुख-हर्ता
तुम भाग्य-विधाता
तुम ही सबके दाता

सुना है
तुम्हारी अनुमति के बिना
एक पत्ता भी नही हिलता
ये प्राणवायु, नदिया की धारा
समंदर, पहाड़, पत्थर
सब में समाहित हो तुम

अब एक बात बताओ 
जब ये सब सच है
तो एक बार आगे बढ़कर
तुम खुद ही कभी अपने ऊपर 
सारा दोष क्यूँ नहीं ले लेते
हटते क्यूँ नहीं
हम सबकी दुनिया से
क्या तुम्हें समझ नहीं आता
इस सब की जड़ 
'बस तुम ही रहे हो सदैव'

या फिर ऐसा करो
एक ही झटके में
ख़त्म करदो ये दुनिया
और करो पुनर्निर्माण
इंसानियत का
बस, इस बार
उस पर
मेड इन हिंदू, मुस्लिम,
सिख, ईसाई, जैन,पारसी
या कोई अन्य धर्म का
ठप्पा लगाकर न भेजना
बस, 'मेड बाय गॉड' काफ़ी है  

और क्या कहूँ, मेरे दोस्त
जी बहुत व्यथित है 
जब रोक नहीं सकते
मानवता की लाश को
हर गली चौराहे पर 
दिन-प्रतिदिन गिरने से
तो हर बात का
श्रेय भी क्यूँ लेते हो 
छोड़ ही दो न 
हमें अकेला हमारे हाल पर 
प्लीज फॉर योर ओन सेक 
जीने दो हमें चैन से अब 
तुम्हारे नाम के बिना!
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 

Wednesday, September 16, 2015

मेरी दुनिया

देखते हुए तस्वीरें 
चेहरे की मांस-पेशियां 
करतीं हंसने की
नाक़ाम चेष्टा 
पलटतीं, कसमसातीं 
भीतर सिहराता दर्द 
तलाशता शून्य में 
खोया हुआ कुछ 
और एक आवाज़ सुनते ही 
सब शिथिल, 
विलुप्त, गड्डम-गड्ड 
गोया स्मृतियों को भी 
एकांत की गुज़ारिश 
तभी तो झुंझला गईं 
यूँ अकस्मात् 
सिमट जाने से

आकाश में जगमगाता 
एक ध्रुवतारा 
या जमीं की ओर 
बढ़ता कोई सितारा 
कभी अपना नहीं होता 
सब भ्रम है, झूठी तसल्लियाँ 
चाँद को देखने से भी कहीं 
दूरियाँ मिटती हैं भला 
हाँ, सुखद है 
ये काल्पनिक उपस्थिति

ग़र मृत्यु-आलिंगन 
सुनिश्चित करता 
क्षण भर का भी दृष्टिभ्रम 
तो जीवित रहना 
निरुद्देश्य था 
पर रहना है 
रहना ही होगा 
उसने कहा था 
'मेरे जाने के बाद ही 
समझ सकोगी दुनिया को'
मैं चुप थी
शब्दों की भावभंगिमा ने 
अनकहा भी कह डाला
समझ गई, ये सूचना भर है 
'जाना' तय हो चुका!

भावों को मोतियों में पिरोकर 
रोकती रही टूटकर बिखरने से
सर झुकाये
समेटती रही 
अपनी ही यादों का कफ़न 
और कितनी दफा कहती 
"मेरी दुनिया तुम हो 
उसके पश्चात् समझने को 
अब शेष रहा भी क्या "
- © 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित
Pic : Clicked by me

Monday, September 7, 2015

तुम, पूछना अवश्य !


ओह, मासूम बच्चे 
ये उम्र नहीं थी तुम्हारी
इस तरह जाने की
अभी बस कल ही तो तुमने 
माँ कहकर उसे गले लगाया होगा 
और पापा की उंगली थामे 
निकले होगे कभी शाम को 
देखते होगे टुकुर-टुकुर आँखों से 
पंछी, पौधे, नीला आकाश 
सब कुछ आश्चर्यचकित होकर  
कितने प्रश्न कौंधें होंगे 
ह्रदय में तुम्हारे 
जिनका उत्तर तुम्हें 
मिलना ही चाहिए था !

तुम्हें सीखनी थी गिनतियाँ 
कंठस्थ करनी थी 
कितनी ही बाल कवितायेँ 
खींचनी थी, आड़ी-टेढ़ी लकीरें 
पन्नों और दीवारों पर 
भरने थे उसमें 
अपनी कल्पनाओं के तमाम रंग
छुपना था कहीं किसी परदे के पीछे 
और "मैं यहाँ हूँ' कहकर 
इठलाते बाहर आना था 
तुम्हें अपनी तोतली जुबाँ से करनी थी तमाम ज़िद 
और इस सुनहरी हंसी से जीत लेनी थी दुनिया!

लेकिन मेरे आयलान 
ये दुनिया हंसती कहाँ है आजकल ?
और न ही हंसने देती है किसी को 
तभी तो छीन ली तुमसे 
तुम्हारी खिलखिलाहट 
और किनारे ला छोड़ा तुम्हें
निपट अकेला 
उसी रेत पर 
जहाँ टीले बनाने की उम्र थी तुम्हारी!

तुम इस दुनिया में 
कक्षा का पहला पाठ भी न 
पढ़ सके 
और देख ली, तुमने 'दुनियादारी'
काश, अब हम सब भी 
न मुंह फेरें 
रेत पर औंधे मुंह सोती हुई सच्चाई से 
पुरानी कहावत हुई 
कि "दर्द को महसूस किया जा सकता है 
वो दिखता नहीं"
इधर तुम्हारी तस्वीर 
कलेजा चीरकर रख देती है!

ओ मेरे, नन्हे दोस्त
अलविदा तुम्हें ! 
लेकिन पूछना अवश्य 
उस ईश्वर से 
जो लहरें बन तुम्हें,
इंसानियत की लाश ठेलता 
तट तक बहा तो लाया 
पर जीवित क्यूँ न रख सका ?
उसकी न्याय की पुस्तक में 
हर निर्णय, देरी से ही क्यों आता है ?
कैसे बर्दाश्त होती है उसे 
किसी निर्दोष की निर्मम मौत ?
क्यों बचा लेता है वो आततायियों को,
गुनाह के बाद भी 
इक और गुनाह करने के लिए !!
आख़िर, दूसरे के पापों की सजा 
बेबस, मासूम लोग ही क्यों भुगतते हैं ??
- प्रीति 'अज्ञात'

एक तस्वीर Aylan Kurdi की, Twitter से साभार !

Thursday, September 3, 2015

शायद, कभी...!

आओ, काटो, रेत दो 
उम्मीदों का गला 
कि इंसान न बन सके तुम 
तोडना चाहते हो 
इरादों को ?
खरीदोगे, जज़्बातों को ?
जाओ, जाकर सीख लो 
पहले इंसानियत 
तो समझ सकोगे 
संवेदनाओं को 
और शायद फिर 
हर शब्द का अर्थ 
पर यक़ीं हो चला 
तुम जैसों का
इस दुनिया में 
होना ही व्यर्थ !

मत भूलना कि 
शब्दकोष की थाह नहीं होती 
अधर्म, अन्याय की कोई 
मंज़िल, कोई राह नहीं होती 
पर ग़र तय हैं तुम्हारी राहें 
तो कान खोलकर सुन लो 
कि कोई न ख़त्म कर सका 
शब्दों की भाषा 
ये तो है वटवृक्ष  
जो नित ही जन्म देगा   
अनगिनत शाखाओं को 
तुम्हारा हर प्रहार
उतनी ही गति से 
पैदा करता जायेगा 
रोज दो नए अविजित,
जगेन्द्र, अक्षय, कलबुर्गी 
और फिर चार 
चार से सोलह 
बत्तीस, चौंसठ 
बढ़ता रहेगा आंकड़ा 
हार जाओगे तुम 
वार करते-करते 
और एक दिन
ग़श खाकर 
इसी वृक्ष की छाँह में 
सुस्ताना पसंद करोगे !

यक़ीन मानो, तब तुम्हें भी अपने घृणित कृत्यों पर भीषण पीड़ा होगी और शायद अफ़सोस भी !

© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 
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बस, नाम ही तो अलग है और क़ातिलों के चेहरे भी ! पर सच्चाई को ख़त्म करने की 'मौत के सौदागरों' की मंशा नहीं बदली !
इधर दु:ख का वही पुराना, घिसा-पिटा राग...... कि ये भी एक आम आदमी के जीवन की 'सामान्य घटना' बनकर रह जाने वाली है! हम भी लिखते-लिखते थक ही जाएंगे, कभी-न-कभी !