तुम्हारे नाम का 'आख़िरी ख़त'
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न जाने कितनी बार
लिखा, मिटाया
हर बार जताना चाहा
अपना गुस्सा
पर कुछ इस तरह
कि तुम
उदास न हो जाओ कहीं
मैं जानती हूँ
तुम जानते हो
दिल जानता है
'उदासियाँ' व्यर्थ हैं !
मात्र 'उदास' हो जाने से ही
नहीं बदल सकती होनी
होता है कहीं कुछ
तो इन उदासियों का
ख़ामोशी से
मायूस समर्पण
मायूसी का भंवर
निगल लेता
एक ही झटके में
पर डुबोता धीरे-धीरे
कि दर्द की तलहटी में
सहम बैठ जाये,
उम्मीदों का कलेजा
और डूबते-उतराते
निर्जीव हो, बिखरने लगें
इच्छाओं के 'पर' !
यक़ायक़ खो गए
शब्दों के मायने
सुर्ख़ यादें, झर रहीं
पीले पत्तों-सी
व्यथित हृदय
पूछता सवाल
दोषी कौन ?
बहते जवाब
'अर्थ' बन,
मुर्दा आँखों से
अथाह सागर
खोया किनारा
हतप्रभ लहरें
न समझ सकीं
कब लौटने लगे
शिकायतों के पाँव
अनधिकृत क्षेत्र में
प्रवेश, वर्जित देख
ठगी-सी खड़ी,
इक बँधी मुट्ठी में
अब तक भौंचक,
'आख़िरी ख़त'
कसमसाया और
पुर्जा-पुर्जा हो
गलता रहा वहीं
इधर टुकड़ा-टुकड़ा मन,
फैलने लगा
काग़ज़ों पर !
- प्रीति 'अज्ञात'





