Tuesday, April 10, 2018

ज़िंदगी, हर रोज़

रोज़ ही नाराज़ हुई फिरती हूँ 
रोज़ ही दिल से गले मिलती हूँ
रोज़ ही चीरती है ज़ख्म मेरे
रोज़ ही बैठकर मैं सिलती हूँ  

रोज़ ही भूलना चाहती हूँ इसे 
रोज़ ही यादों में इसकी धंसती हूँ 
रोज़ ही दिल ये डूबता है मेरा
रोज़ ही खुल के ख़ूब हँसती हूँ

रोज़ ही छोड़ने की कोशिश में 
रोज़ ही इश्क़ इसको करती हूँ
रोज़ ही जीती हूँ उम्मीदों में 
रोज़ ही टूटकर भी मरती हूँ 

रोज़ ही काटती है पंख मेरे 
रोज़ ही जोरों से ज़रा उड़ती हूँ
रोज़ ही तोड़ती है जी भरके 
रोज़ ही थोड़ा-थोड़ा जुड़ती हूँ  

रोज़ ही चुप्पी साधती हूँ कहीं 
रोज़ ही बेवजह भी बकती हूँ 
रोज़ ही सोचती आराम करूँ 
रोज़ ही चूरकर मैं थकती हूँ 

रोज़ ही जगती हूँ सूरज की तरह 
रोज़ ही साँझों को तनहा ढलती हूँ   
रोज़ ही शिक़वा इसी से होता है  
रोज़ ही इधर को लौट चलती हूँ 
- कॉपीराइट © प्रीति 'अज्ञात'

Saturday, April 7, 2018

इश्क़ बस देह भर ही नहीं होता जानां!

इश्क़ बस देह भर ही नहीं होता जानां 
ये जो एक थकान भरे दिन के ढलते-ढलते 
जब उसका हाथ थाम तुम कहते हो न 
सुनो, अब बैठ भी जाओ कुछ पल 
कितना काम करती हो दिन भर 
वही इश्क़ की पहली फुहार बन महकती है

किसी सुस्त रविवार की अलसाई सुबह की
अधखुली आँखों की इक मासूम करवट 
जब वो घड़ी देख अचानक उठ बैठती है घबराकर 
एन उसी वक़्त चाय का कप आगे सरकाकर तुम्हारा यूँ कहना 
लो, आज मेरे हाथों की चाय पीकर देखो 
ख़ुदा क़सम! इश्क़ की कहानी तभी पायदान चढ़ती है

मेहमानों के अचानक आने और उसकी हड़बड़ाहट के बीचों-बीच 
तुम्हारा झटपट सलाद तैयार कर
क्रॉकरी निकाल देना भी 
इश्क़िया अहसास का एक धड़कता पन्ना ही तो है

वो जब कहीं लौट जाने को उदास मन और भरी आँखों से
मुस्कान को होठों से सटाकर, चुपचाप लगी होती है पैकिंग में
उसी समय उसकी ज़रूरी चीज़ें पलंग पर रख आना
उसके कपड़ों को धूप में सुखाना या पलट आना 
तौलिये को भीगने से बचाने की सोच लिए
अपनी तौलिया थमा आना 
ये सारे भाव इश्क़ के अपठित गद्यांश हैं प्रिय

ट्रेन के सफ़र में हँसते हुए उसे विंडो सीट थमा देना 
या कि शरारती आँखों से बैग को बीच से हटा
हौले-से उसके और क़रीब खिसक आना
ये भी इस मुए इश्क़ की ही करामात है जानां

तुम्हें क्या पता कि किसी भीड़भाड़ भरे प्लेटफॉर्म या
वाहनों से पटी सड़क पर 
उसकी अंगुली को किसी बच्चे की तरह थाम लेना
कैसे सुरक्षा-कवच की तरह ढक लेता है उसे 
यही तो है इश्क़ का सबसे ख़ूबसूरत अंदाज़ ए बयां

आहिस्ता से उसके माथे को चूमना
कंधे पर सर टिका बैठना
उंगलियों में उंगलियाँ फंसा कुछ भी न बोलना 
या गोदी में यूँ ही सर रख लेट जाना 
एक ही प्लेट में साथ भोजन खाना 
उसके प्यारे पंछियों के लिए 
दाना-पानी रख आना 
उसके इर्दगिर्द यूँ ही गुनगुनाना 
तो कभी एकटक देख बेवज़ह मुस्कुराना 
ये सब और ऐसी कितनी ही ढेरों अदाएँ 
इश्क़ की किताब की अनगिनत,अनकही बातें हैं

पर जब भी ऐसा कुछ करो 
तो स्त्री की आँखों को जरूर पढ़ना 
और देखना इश्क़ की लहर को गुजरते हुए
खिलखिलाती, मचलती अदाओं को ठुनकते हुए
यूँ तुम तो जानते ही हो, पर फिर भी 
कहा है दोबारा तुमसे अभी 
इश्क़ बस देह भर ही नहीं होता जानां!
है न! 😍
- प्रीति 'अज्ञात'

Wednesday, April 4, 2018

बाबाजी का ठुल्लू

ताजा काव्य 

छोड़-छाड़ के मोह सग दुनिया दई थी त्याग 
पर का करिहें देस में मच गई इत्ती आग 
मच गई इत्ती आग के न रओ, काऊ को कछु मोल 
आये मंत्री भांजके, बाबा दुनिया है गई ढोल

हाय! दुनिया है गई ढोल तो फित्तो, आओ हमऊ बजाएँगे
मारा गला में डार के, चर्चा-चिंता करवे आयेंगे
तुम मुरख बस लड़त फिरो और करो नौकरिया खोज 
राजाजी के राज में हमरी तो है गई मौज

मिल गयो डीज़ल, नौकर चाकर, घूमन काजे भत्ता 
तुम टुकुर-टुकुर कत्ते रहियो हमको तो मिल गई सत्ता 
पढ़ लिखके कछु न होएगो, बस बनते रईयो उल्लू 
भौत चिरात थे पैले हमको, अब तुम ल्यो बाबाजी को ठुल्लू 
- कॉपीराइट © प्रीति 'अज्ञात'
Pic Credit: Google

Wednesday, January 31, 2018

ऋण

ऋण है हम पर 
पंछियों, हवाओं और 
तेज, तूफ़ानी बारिश का  
जिन्होंने बीज-बीज छितराकर,
बहाकर  
घने जंगल बसाए 
और हमने उन्हें उखाड़ 
पत्थरों के कई शहर बना लिए
इधर हम विकसित लोग 
अब तरसते हैं हवा-पानी को 
उधर हताश पंछी भटक रहे 
घोंसले की तलाश में 
जंगली जंतुओं के शहर तक चले आने में 
तुम्हें हैरत क्यों है भला?
प्रश्न यह है कि 
अतिक्रमण, किसने किया है किस पर
आह! देखती हूँ जब भी गगनचुम्बी इमारतें 
मेरे भीतर एक जंगल अचानक 
लहलहाकर गिर पड़ता है 
- प्रीति 'अज्ञात'

Thursday, January 25, 2018

नेता और अफसर

जैसे ही नेता जी चीखे 
अफसर बोले, आया जी 
युग बीते हैं इन चरणों में
पर गले नहीं लगाया जी 

तुम जात-पांत के खेला में 
हाय हमको दद्दा भूल गए 
जान निछावर करके हारे 
कुछ भी न हमने पाया जी 

मां-बाबा के इकलौते थे 
और जी-जान से पढ़ते थे 
तुम लड़ते संसद में जैसे 
हम घर पर भी न करते थे 

अरे, राजा हो या प्यादा हो
पर भाषा की मर्यादा हो
मत भूलो सम्मान किसी का
शिक्षा ने सिखलाया जी

पर राजनीति की कीचड़ ऐसी 
अच्छा-बुरा बराबर है
जिसका, जितना खेल भयंकर 
वही हुआ कद्दावर है 

देशप्रेम की ख़ातिर हमने 
किस्सा ये समझाया जी 
पीर हिया की बाहर निकली 
मन को हल्का पाया जी  
 -प्रीति 'अज्ञात'

Wednesday, January 24, 2018

आश्वासन

सरकारें बनतीं-बिगड़तीं
गिरतीं- संभलतीं
पर उठकर कभी खड़ा ही न हो पाता
बेबस, लाचार आदमी
मुद्दों की धीमी-धीमी आँच पर 
दशकों से सिक रहीं
गुलाबी वादों की करारी रोटियाँ
समयानुसार उठती है फुँकनी
पहुँचती है मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारे तक 
कि लौ दिखती रहे
और आँतों से गलबहियाँ कर 
चिपकी रहे बुभुक्षा 

पर अब तक अटकी हुई 
आशाओं के शुष्क गले में  
आश्वासनों की सूखी सैकड़ों हड्डियाँ 
जिन्हें बारम्बार निगलने की कोशिश में 
धँसता जा रहा आदमी
उम्मीद की पसरी आँखें
अब भी चूल्हे पर
कि कभी तो परोसी जायेंगीं रोटियाँ

इधर निरीह, झुलसी
ग़रीबी का उदास चेहरा लिए
बुझती लकड़ियाँ
अन्न की प्रतीक्षा में
मिट्टी की चहारदीवारी में 
बेचैनी से बदलती हैं करवटें  
कि देखें क्या निकलता है पहले
गले की हड्डी 
या आदमी का दम  
- प्रीति अज्ञात 

Friday, January 19, 2018

इश्क़

इश्क़, जैसे कड़कड़ाती सर्दी में
खिली-खिली धूप
और रजाई में कुटर-कुटर करती 
मूंगफली

इश्क़, जैसे सुबह
आँगन में पसरा हरसिंगार
और खुली खिड़की से झाँकता
झूलता-इठलाता सूरजमुखी

इश्क़, जैसे तपती गर्मी में
अनायास बहती शीतल हवा 
और बारिशों में घुलती   
सौंधी मिट्टी की ख़ुश्बू 

इश्क़, जैसे उबलती चाय से 
महकते अदरक-तुलसी
या कि बर्फ़ मौसम में 
धीमी-धीमी सुलगती सिगड़ी 

इश्क़, पंछियों का कलरव 
तितलियों का चटख़ रंग
हरित पत्तियों से लिपटा मोती
और नन्हे बच्चों का हुड़दंग 
 
इश्क़, जैसे एक अदद ज़िंदग़ी में 
क़बूल हुई कोई दुआ 
इश्क़ मैं, इश्क़ तुम  
इश्क़ से ही तो जग रोशन हुआ  
- प्रीति 'अज्ञात'