Friday, October 2, 2015

झकास!

कहा था उसने
बरसों पहले कि  
एक तमाचे के पड़ते ही
बढ़ा देना दूसरा गाल 
न करना हिंसा का समर्थन
भूलकर भी कभी 
थामे रहना हमेशा
सच्चाई का दामन 
बदलते दौर और
लुप्त होती इंसानियत के बीच
कितना मुश्किल है
'गाँधी' सा होना

पर पलटकर एक और
प्रहार करने से भी
हासिल क्या ?
बढ़ती रहेंगी लड़ाइयाँ
होंगे आरोप-प्रत्यारोप
समाधान तो फिर भी न
निकल सकेगा!
और जो थामा, तुमने
झूठ का दामन
तो खुद ही सोचो
कैसे बुनोगे
रोज एक नई कहानी
'असत्य' की ?

'सत्य' तो यूँ भी
तय है, उज़ागर होना 
तो क्यूँ न बदल लें
हम विरोध के तरीके
और शर्मिंदा होने दें
उन्हें खुद ही अपने
हर गलत कृत्य पर

हाँ, कर लिया है प्रण
गहरा फिर इस बार
होगा बस
गाँधीगिरी का ही वार
यही मेरा विश्वास है
यही सबसे ख़ास है
है दिखने में छोटा
थोड़ा कमजोर ही सही
पर यक़ीन है, अब भी
उतना ही, पहले-सा 
वो आदमी 'झकास' है !
-प्रीति 'अज्ञात'

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