Thursday, September 25, 2014

वक़्त के साथ-साथ..

ये न कविता है, न कहानी है
वही मासूम ज़िंदगानी है
तुम हँसे थे देख, जिनको कभी
उन्हीं आँखों से गिरा पानी है.

तमाम उम्र जिसका इंतज़ार रहा
वो मिले भी तो, कभी कुछ न कहा
बदलते दौर संग बदलते रहे
रिश्ते हैं या मौसम की ये रवानी है.

वक़्त के दरिया संग बहते रहो
न करो उफ़ भी, ज़ख़्म सहते रहो
कल यहाँ थी, अब दिखेगी कहीं
ये मोहब्बत भी आनी-जानी है.

न गमगीन हो बैठो यूँ अभी
तुम्हारी मौत खुद आएगी कभी
न मानें हार जो हिम्मतवाले
इक कोशिश की फिर से ठानी है.

मतलबी दुनिया में ढूँढे किसको
न चली दिल की भी मनमानी है
दौरे-तूफ़ां में कोई थामेगा तुझे
तेरी ये सोच ही बचकानी है !
- प्रीति 'अज्ञात'
चित्र : गूगल से साभार !

Wednesday, September 24, 2014

उलझनें

वक़्त की तंग गलियों से निकल, 

फिर उसी दोराहे पर आकर खड़े हैं हम. 

जहाँ सच और झूठ की दीवारों पर 

विश्वास और अविश्वास की परछाईं है. 

ख़्वाबों को मुट्ठी में बाँधे हुए, 

जज़्बात की हालात से कैसी ये लड़ाई है? 

कभी बनती और कभी बिगड़ती-सी, 

आसमाँ पर बादलों की कितनी तस्वीरें ! 

कैसे खो-सी जाती हैं धुआँ होकर, 

जैसे ज़िंदगी से मेरी तक़दीरें !

आज फिर भीगी पलकें हैं, और दिल में 

वही ख़लिश-सी छाई है..... 

रुँधे गले से कंपकँपाते शब्द कहते आकर 

इस ज़ंग में भी तूने मात ही खाई है. 

वक़्त का जोर या बदक़िस्मती का शामियाना, 

अपनी तो हर हाल में रुसवाई है. 

साथ देने को तैयार खड़ी खामोश-सी ये 'ज़िंदगी' 

क्यूँ भला अब तक न हमें रास आई है !

- प्रीति 'अज्ञात'

Tuesday, September 16, 2014

शोर..?

सन्नाटे को रौंदती हुई
कुछ आवाज़ें
अपने ही कानों में पलटकर
शोर करतीं हैं
लाख पुकारो
चीखो-चिल्लाओ
घिसटते रहो, संग उनके
मनाओ, अनसुना हो जाने
का भीषण दु:ख
जो पास है, वही
कचोटता रहेगा
स्मृतियों की जुगाली बनकर !

उसका निष्ठुर मन

न जान सकेगा
'जो कहना था..
...बाक़ी ही रहा'
चलो, अलविदा
अब मथता रहेगा मन
उस असीम संभाव्य को
जिसकी तलाश में
बीता समय, मलता चला गया
धूल अपने ही चेहरे पर !

न सुना है, न सुन सकेगा

उम्मीद जो, हर रोज खोई
न शिकायत, न इंतज़ार
बस, वही कसक है बाकी
खैर... आसमाँ के उस पार से
चाहकर भी वापिस
कहाँ लौट सका है कोई !
- प्रीति 'अज्ञात'

Sunday, September 14, 2014

मैं 'हिन्दी'

आज 'हिन्दी दिवस' पर, 'हिन्दी' खुद कैसा महसूस करती होगी, उसके अंतर्मन में झाँककर जानने की कोशिश की है -

मैं 'हिन्दी'
बस आज ही, चमक रही
'मृगनयनी-सी'
कभी बनी
'वैशाली की नगर वधू'
तो कभी
'चंद्रकान्ता'
हो 'मधुशाला'
बहकी भी
खूब लड़ी 'झाँसी की रानी'
'पारो' बन चहकी भी !

दिखी कभी राहों पर
'तोड़ती-पत्थर'
तो कभी
किसी 'पुष्प की अभिलाषा'
कहलाई
'नर हो न निराश करो मन को'
कह 'मैथिली' ने 
उम्मीद की अलख जलाई !

फिर क्यूँ बैठी हूँ
आज तिरस्कृत
'प्रेमचंद' की 'बूढ़ी काकी' बनकर
सिमटी हुई
अपने ही घर के
एक कोने में
कर रही इंतज़ार
कि कोई लेगा सुध
मेरी भी कभी
ठीक वैसे ही जैसे
'हामिद' आया था
'उस दिन'
'अमीना' का चिमटा लेकर !

पर 'हामिद' बन पाना
सबके बस की बात कहाँ
हर 'अहिल्या' को नहीं मिलता
अब कोई 'राम' यहाँ !
बात है 'आत्म-सम्मान' की
हाँ, अस्तित्व और स्वाभिमान की
खड़े होना होगा, स्वयं ही
सुना है....
'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती'
'बच्चन' ने भी गुना है
'किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अंधेरी रात पर, दीवा जलाना कब मना है'

'हिन्दी' का 'दिया', अब हर घर में जलाना होगा, 'मातृ-भाषा' को उसका खोया सम्मान दिलाना होगा, एक वादा करना होगा, केवल आज ही नहीं....बल्कि हर दिन अपनी 'राष्ट्र-भाषा' को अपनाना होगा ! अन्य भाषाओं का भी मान रहेगा पर 'हिन्दी' किसी से कमतर है, इस सोच को सबके दिलों से निकालना ही होगा ! आख़िरकार...."हिन्दी हैं हम, वतन है...हिंदोस्ताँ हमारा"......सारे जहाँ से अच्छा !
- प्रीति 'अज्ञात'

Tuesday, September 9, 2014

बीते वो पल.....

  
बीती हुई यादों का जमघट, 
अब भी हमारे साथ है. 
खोए, सारे पल वो अपने, 
बस दर्द का एहसास है.

अपनी ही मर्ज़ी से..., झूठे
रिश्तों को खारिज़ किया. 
आज आँसू बन वो निकले, 
हमको लावारिस किया. 

दोस्त कहने को बहुत से, 
पर साथ में कोई नहीं. 
अश्क़ अब बहते रगों में, 
आँख ये सोई नहीं. 

अपनी किस्मत के हैं मालिक, 
क्या है, जो ठोकर खाएँगे
तन्हा ही आए जहाँ में, 
तन्हा ही हम जाएँगे...!

- प्रीति 'अज्ञात'

Saturday, July 19, 2014

भीड़.....

भीड़ अब व्यथित नहीं 
लज्जित भी नहीं
रोज ही औंधे मुँह
निर्वस्त्र पड़ी स्वतंत्रता भी
नहीं खींच पाती ध्यान
नहीं आता अब कलेजा मुँह को
उतारी जाती हैं, तस्वीरें
'प्रथम' होने की होड़ में
ब्रेकिंग न्यूज़ में बार-बार
दिखेगा हर कोण !

दुखद घटना जो हुई है
सो, आएँगी संवेदना भी
हर दल की, एक दूसरे पर
दोष मढ़ने की उत्सुकता लिए.
इधर लुटती रहेगी अस्मिता
चादर के अंतहीन इंतज़ार में
उधर बिछेगी दरिंदगी सड़कों पर.
सभ्यता और संस्कारों के
कई पुख़्ता सबूत मिलेंगे
उन जिस्मों से बहते लहू में !

होगी जाँच, आक्रोशित चर्चा
क़ानून के खिलाफ 
कुछ गुमनाम आवाज़ें उठेंगीं
निकलेगी रैली, होगा मौन,
शायद जलें मोमबत्तियाँ भी.
सारे तमाशों के बाद
वही खून से सना अख़बार
बिछेगा अलमारी में.

सुनाई देते रहेंगें 
अब और भी ऐसे
'आम' समाचार
'आम' जनता के
'आम' जनता के लिए,
बदबू मारती, वस्त्र-विहीन
बेहद घिनौनी मिलेगी,
एक और लहूलुहान लाश
हर रोज ही
अपने इस विकृत प्रजातंत्र की
अपने ही बने किसी चौराहे पर !

-प्रीति 'अज्ञात'

*.पर तुम विचलित न होना, ये तुम्हारा 'अपना' जो नहीं ! 'भीड़' का कोई नहीं होता, अपना चेहरा भी नहीं....यही 'ख़ास पहचान' है, इसकी ! 'आम' इंसान होना, क्या 'खास' ??

Thursday, July 10, 2014

प्रेम

प्रेम' होता नहीं
मिलता जाता है
जन्म लेते ही,
माता-पिता से
परिवार से, मित्रों से
शिक्षकों से
प्रेमी / प्रेमिका से
पति / पत्नी से
घर-बाहर, हर स्थान पर
उपलब्ध है 'प्रेम'
बिक भी जाता है कहीं
अभावों की मार से
अल्हड़, मासूम प्रेम.

हर रिश्ते में पूरी तरह
नहीं पाता ये स्वयं को
खो जाता है कहीं
अधूरा ही छूटा हुआ
हथेलियों से फिसलकर
निरीह, बेचैन प्रेम.
रह जाते हैं, महीन छिद्र,
उन्हीं सूराखों से रिसकर 
एक दिन घबराता-सा
व्याकुल हृदय से बाहर
निकल आता है प्रेम,
तलाशने को, इक और 'प्रेम'.

कहीं भ्रम, कहीं विवशता
कभी अचानक, कभी सोचा-समझा
कुकुरमुत्ते-सा, हल्की नमी पाते ही
उग आता है प्रेम.
सुंदर इठलाता हुआ
नवांकुर-सा, रूपांतरित हो
हरीतिमा से आच्छादित
मोगरे के फूलों-सा 
सुरमित कर वातावरण को
महक, बहक जाता है प्रेम.

फिर वही सर्व-विदित सत्य
समय की तीक्ष्ण धूप और
अपनी ही परछाईयों की शाम ओढ़े
यकायक, बिन कहे
कभी फफूंद-सा सड़ता,
बैठता मुरझाया हुआ
उदास, कुम्हलाकार
झुलस जाता है प्रेम.

मायूस हो सर झुकाए लौटता
उसी टूटे खंडहर में,
खुद से हारा हुआ
बदनाम, लाचार 'प्रेम'.
अब झाँकता है, उन्हीं
महीन छिद्रों से
जिन्होंनें कायान्तरित हो
भीतर-ही-भीतर
बुन ली भय की गहरी खाई
इसी अंधेरे कुँए में डूबकर
एक दिन अचानक ही
विलुप्त हो जाता है 'प्रेम' !

प्रीति 'अज्ञात'
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